शासन स्तर से कोई ऐसा प्रयास नहीं किया जा रहा जिससे इनकी दशा व दिशा में बदलाव आ सके। परिषदीय विद्यालयों में योजनाएं तो तमाम संचालित की जा रही है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता की तरफ किसी का ध्यान नहीं।
इसके लिए शिक्षकों की मनमानी तो दोषी है ही शासन प्रशासन की उपेक्षा भी काफी हद तक जिम्मेदार है। चहारदीवारी के संकट तो कहीं कुर्सी मेज की कमी। बिजली, पानी, जर्जर भवन समेत तमाम समस्याएं है जिनका निराकरण आज तक नहीं हो सका। कई स्कूल तो ऐसे हैं जनके पास अपना खेल मैदान तक नहीं है।
यही हाल हाईस्कूल व इंटरमीडियट स्कूलों का भी है। इनमें अधिसंख्य स्कूल ऐसे हैं जहां न तो खेल मैदान हैं, और न ही प्रयोगशालाएं। उधर इसके इतर निजी स्कूलों में सारी व्यवस्थाएं नजर आती हैं।
निजी विद्यालयों में शिक्षकों का भुगतान उनकी योग्यता व जिम्मेदारी के आधार पर किया जाता है, जबकि सरकारी व सहायता प्राप्त विद्यालयों में पूरी तरह मनमानी का माहौल साफ दिखाई पड़ता है। लोगों का मानना है कि मोटी पगार पाने वाले सरकारी शिक्षकों के वेतन भी यदि उनकी परफार्मेंस पर दिया जाए तो भी काफी हद तक सुधार आ सकता है।