अंबेडकरनगर। चढ़ावे की आंच पर धधकतीं अवैध शराब की भट्ठियां ही अकसर जानलेवा साबित हो जाती हैं। मामूली लागत में लगभग 10 गुना अधिक कमाई का चस्का ही शासन-प्रशासन के तमाम दावों के बाद भी नहीं रुक पाता। इसके चलते ही जब तब जहरीली शराब के जरिए मौत होने या फिर हालत बिगड़ने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। सब कुछ जानकारी में होने के बाद भी आबकारी व इलाकाई पुलिस के मुंह मोड़े रहने से बेखौफ धंधेबाज प्रत्येक मौसम में जहरीली शराब के कारोबार को धड़ल्ले से जारी रखते हैं।
कार्रवाई के नाम पर अकसर रस्म अदायगी को छोड़ यदि पुलिस व आबकारी महकमा वाकई गंभीर हो जाए तो निश्चित रूप से जहरीली शराब के कारोबार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। अवैध शराब के धंधे से जुड़े जानकारों के अनुसार महज एक लीटर स्प्रिट की लागत से बाजार से सस्ती दर पर तेज नशा देने वाली अवैध शराब की बोतल तैयार हो जाती है। पुराने हो चुके धंधेबाज शराब का सुरूर बढ़ाने के लिए नाम मात्र के महुआ के साथ इसमें यूरिया, ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन, गुड़ का शीरा व इथनाल तक मिलाने से परहेज नहीं करते।
पड़ोसी जनपद अयोध्या के गोसाईगंज थानांतर्गत त्रिलोकपुर गांव में जहरीली शराब से हुई मौत के बाद शराब के अवैध कारोबारियों पर अंकुश लगाने की मांग तेज हो गई है। अयोध्या से लेकर अंबेडकरनगर व आसपास के जनपदों में जहरीली शराब धड़ल्ले से बिकती रहती है। इसमें कई बार बाहर से आयी शराब शामिल रहती है तो कई बार स्थानीय भट्ठियों पर बनने वाली शराब की भी बिक्री खुलकर की जाती है।
अंबेडकरनगर जिले में भी अवैध शराब बनाने की भट्ठियां जहां-तहां चढ़ावे की आंच के बूते धधकती रहती हैं। तमाम गांवों में खुलेआम शराब बनाने की अवैध भट्ठियां चलती हैं। इनकी जानकारी इलाकाई पुलिसकर्मियों से लेकर आबकारी विभाग के कर्मचारियों तक को रहती है। सूत्रों के अनुसार सेटिंग के चलते ऐसे कारोबारियों पर कोई आंच नहीं आती। शासन के निर्देश पर चलने वाली विशेष मुहिम के दौरान यदा-कदा औपचारिकताएं जरूर निभाई जाती हैं, लेकिन चढ़ावे की आंच इतनी मजबूत रहती है कि भट्ठियां की आंच बुझाने के लिए संबंधित स्थानों पर पुलिस व आबकारी विभाग के कर्मचारी पहुंचते ही नहीं।
ऐसे तैयार होती है जहरीली शराब
जहरीली शराब के धंधे के जरिए लंबा मुनाफा कमाने की सनक में ऐसे लोग शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति की सेहत दांव पर लगाने से परहेज नहीं करते। मुनाफा ज्यादा हो और नशा कम न हो, इसलिए जहरीले केमिकल्स का प्रयोग भरपूर मात्रा में कर देते हैं। कम कीमत पर ज्यादा नशा देने के लिए एक लीटर स्प्रिट की लागत में नाम मात्र का महुआ मिलाकर साढ़े तीन लीटर अवैध शराब बनायी जाती है। इसमें सुरूर बढ़ाने को यूरिया, ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन, गुड़ का शीरा मिलाकर देसी शराब के खाली पौवा शीशी में पैक कर 40 से 45 रुपया की दर से खपाया जाता है, जबकि आबकारी विभाग के लाइसेंस पर बेचे जाने वाला पौवा खरीदने पर 70 रुपया खर्च आता है।
इन क्षेत्रों में खूब धधकतीं भट्ठियां
अवैध शराब बनाने का काम यूं तो जिले की सभी तहसीलों में धड़ल्ले से होता आ रहा है। हालांकि टांडा व आलापुर तहसील में सरयू नदी के किनारे स्थित माझा क्षेत्र इसके बड़े केंद्र के तौर पर पहचाने जाते हैं। न सिर्फ नदी के किनारे वरन सरयू की धाराओं के बीच स्थित क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर अवैध शराब की भट्ठियां धधकती रहती हैं। संबंधित क्षेत्रों से आवागमन करने वाले आम नागरिक अकसर आग से निकलने वाले धुएं को देख शराब बनने का अंदाजा लगा लेते हैं। यही हाल आलापुर तहसील क्षेत्र में सरयू नदी के किनारे स्थित अलग-अलग गांवों का भी है। इसके अलावा बसखारी, भीटी, अहिरौली, जैतपुर व महरुआ आदि थाना क्षेत्रों भी भट्ठियां धधकती रहती हैं।
अवैध अंग्रेजी शराब का भी खूब कारोबार
जिले में सिर्फ देशी शराब के मामले में जहरीली कारोबार नहीं होता। अंग्रेजी शराब को लेकर भी संगठित गिरोह जिले में सक्रिय रहता है। इसकी जानकारी भी आबकारी व पुलिस विभाग के कर्मचारियों को बाकायदा रहती है, लेकिन ऐसे किसी गिरोह का पर्दाफाश करने में उनकी रुचि इसलिए नहीं रहती क्योंकि नागरिकों के अनुसार उनकी जेबें अच्छे ढंग से गर्म होती रहती हैं। लगभग तीन वर्ष पहले एसटीएफ की गोरखपुर से आयी टीम ने अहिरौली थाना क्षेत्र के एक राइस मिल में छापा मारकर अवैध शराब बनाने के कारोबार का पर्दाफाश किया था। तब भी पुलिस व आबकारी कर्मियों को ऐसे किसी कारोबार की भनक नहीं लग पायी थी। एसटीएफ ने न सिर्फ बड़ी मात्रा में स्प्रिट वरन कई नकली ब्रांड की अंग्रेजी शराब केेेे रैपर तथा शराब बनाने के तमाम उपकरण बरामद किए थे। एसटीएफ के इस खुलासे के बाद जनपद पुलिस व आबकारी विभाग की किरकिरी हुई थी।