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90 करोड़ खर्च कर बने अस्पताल में खत्म नही हो रहा स्टाफ तैनाती का इंतजार

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फोटो 7, अंबेडकरनगर के टांडा में चालू नहीं हो पा रहा करोड़ों की लागत से बना यह अस्पताल। - फोटो : AMBEDKAR NAGAR
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विद्युतनगर। 90 करोड़ की लागत से बनकर तैयार मातृ एवं शिशु केंद्र डेढ़ लाख आबादी के लिए छलावा साबित हो रहा है। वर्ष 2016-17 में इस अस्पताल का निर्माण शुरू हुआ। करीब दो वर्ष में काम पूरा हो गया। इस अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं की पूरी व्यवस्था है। हालांकि, स्टाफ तैनात न होने से अस्पताल शुरू नहीं हो पा रहा है। विडंबना यह है कि शासन स्तर से अब तक पदों का सृजन ही नहीं किया गया है। सीएमओ कई बार इस संबंध में पत्र भी लिख चुके हैं, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है। इस वजह से निर्माण पूरा होने के एक साल बाद भी यहां इलाज शुरू न हो पाने से लोग नाराज हैं। उनका कहना है कि अस्पताल शुरू न होने से इलाके की बड़ी आबादी बेहतर इलाज से वंचित है।
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करीब साढे़ तीन साल पहले टांडा तहसील के लोगों को शासन ने बड़ी सौगात दी थी। यहां के अलावा अन्य क्षेत्र के बच्चों व महिलाओं को बेहतर उपचार के लिए चक्कर न लगाना पड़े इसके लिए टांडा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 90 करोड़ की लागत से 200 बेड के अस्पताल की सौगात दी थी। मेडिकल साइंस के हिसाब से तमाम आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित यह पांच मंजिला अस्पताल पूरी तरह वातानुकूलित है।
इस अस्पताल के कर्मचारियों के रहने के लिए आठ मंजिला आवास तहसील के पास मेडिकल केयर यूनिट परिसर में बनकर तैयार है। निर्माण कार्य पूरी तरह अत्याधुनिक मशीनों व आधुनिक तकनीक से हुआ है। अस्पताल में मरीजों को गर्म पानी देने के लिए सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया गया है। इसके काम न करने पर हॉट वाटर जेनरेटर लगाया गया है। आईसीयू में विनायल फ्लोरिंग की गई है। इस पर स्ट्रेचर ले जाने पर आवाज नहीं होगी। तीन स्थानों पर ठंडे पानी की मशीनें लगी हैं। तीन स्थानों पर आरओ से पानी देने की व्यवस्था की गई है। पूरे अस्पताल में आधुनिक तकनीक वीआरवी का प्रयोग किया गया है। इससे कम बिजली लगेगी। स्वाइल ट्रीटमेंट प्लांट भी लगा है जो अस्पताल का गंदा पानी व केमिकल वाले पानी को अलग कर साफ करेगा। इसके लिए परिसर में दो बड़े टैंक बनाए गए हैं।
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बरसात के पानी को धरती के भीतर ले जाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था भी है। मरीजों को आने-जाने के लिए पांच आधुनिक लिफ्ट व बिजली न रहने पर रैम की सुविधा दी गई है। अग्निनिरोधक, आधुनिक कैमरा, इंटरकॉम व मरीजों को बुलाने के लिए साउंड स्पीकर सिस्टम लगाया गया है। इसके अलावा बिजली घर भी बनाया गया है। जब इस अस्पताल का निर्माण पूरा हुआ तब क्षेत्र के लोगों में खुशी का माहौल देखने को मिला।
क्षेत्रवासियों में यह आस जगी कि अब क्षेत्र की महिलाओं व बच्चों को इलाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा। हालांकि, अस्पताल बने एक साल हो गया है, लेकिन अब तक स्टाफ की तैनाती नहीं हो सकी है। कर्मचारियों की तैनाती न होने से करोड़ों की लागत से बनकर तैयार यह अस्पताल डेढ़ लाख से अधिक की आबादी के लिए छलावा साबित हो रहा है। स्थानीय राजेश सोनकर, दिवाकर, अब्दुल हमीद, विवेक कुमार व अख्तर हुसैन आदि का कहना है कि सरकार को अविलंब इसका संचालन करना चाहिए।
टांडा में बनकर तैयार 200 बेड के अस्पताल संचालन के लिए करीब 200 स्टॉफ की जरूरत है। यह सुझाव स्वास्थ्य निदेशालय को दो से अधिक बार लिखे पत्र में दे चुका हूं। इसमें करीब 25 डॉक्टरों की जरूरत बताई है। हालांकि, अब तक वहां से पदों का सृजन ही नहीं किया गया है। स्टाफ न होने से लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। उम्मीद है कि शासन से जल्द ही पद सृजित कर तैनाती कर दी जाएगी।
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- डॉ. अशोक कुमार, सीएमओ
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