उन्हें रस्सी से बांधकर बंद किया जाता है। ऐसे में यदि रस्सी टूट जाए, तो बड़ी घटना से इंकार नहीं किया जा सकता। कई वाहनों के इंजन भी खराब हो गए हैं। रास्ते में जहां तहां बंद हो जाते हैं। कई के टायर भी जवाब दे चुके हैं।
गर्भवती महिलाओं को निकटवर्ती सीएचसी व पीएचसी या फिर जिला अस्पताल तक पहुंचाने तथा घायलों को तत्काल प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराए जाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रहीं 102 व 108 एंबुलेंस सेवा मौजूदा समय में उपेक्षा का शिकार होकर रह गई हैं।
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 102 एंबुलेंस की कुल 22 व 108 एंबुलेंस सेवा के कुल 17 वाहन जिले में हैं। देखरेख के अभाव में किसी के टायर खराब हो गए हैं, तो किसी में फाग लाइट ही नहीं लगी है। ऐसे में ठंडक के दिनों में रात के समय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
इतना ही नहीं, कई वाहन तो इतने जर्जर हो गए हैं कि उनके दरवाजे ही ठीक से नहीं बंद होते। ऐसे में दरवाजा बंद करने के लिए रस्सी की मदद ली जाती है। ऐसा उस समय भी किया जाता है, जब एंबुलेंस में मरीज मौजूद रहते हैं। ऐसे में यदि रस्सी टूट जाए, तो गेट खुलने से कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वाहनों के जर्जर होने से मरीज को लखनऊ ले जाने में कई बार समस्या खड़ी हो जाती है। बताया कि कुछ के टायर खराब हैं, तो किसी में इंजन में अक्सर तकनीकी खराबी आ जाती है।
तीमारदार अरविंद कुमार ने बताया कि बीते दिनों वह अपने रिश्तेदार को घायलावस्था में 108 सेवा से लखनऊ ले जा रहे थे। एंबुलेंस चालक ने एक अतिरिक्त वाहन साथ ले चलने की बात कही। उसका कहना था कि यदि रास्ते में एंबुलेंस खराब हो गई, तो मरीज को अन्य वाहन से तत्काल अस्पताल तक पहुंचाया जा सके। इस पर उन्होंने बोलेरो वाहन किया।