आलापुर (अंबेडकरनगर)। क्षेत्र के मसेना मिर्जापुर ग्राम स्थित शांति विहार कॉलोनी में चल रही श्रीराम कथा में बृहस्पतिवार को प्रवाचक श्रीनिवास दास वेदांती महाराज ने भगवान श्रीराम द्वारा सुनी गई गंगा अवतरण की कथा से भावविभोर कर दिया। जैसे-जैसे व्यास जी ने कथा का वर्णन किया, पंडाल में बैठा हर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गया। जब भगीरथ ने पृथ्वी पर गंगा लाने के लिए कठोर तप किया था।
कथा में बताया कि श्रीराम, ऋषि विश्वामित्र के साथ गिरिव्रज से मिथिला की ओर यात्रा कर रहे थे, तभी वे गंगा तट पर पहुंचे और वहीं रात्रि विश्राम किया। अग्निहोत्र की पवित्र ज्वाला के सामने ऋषियों ने देवताओं और पितरों को आहुतियां दीं। उसी समय ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम को गंगा अवतरण की कथा सुनाई।
व्यासजी ने विस्तार से बताया कि कैसे राजा भगीरथ ने अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति के लिए राजपाट छोड़कर गोकर्ण में कठोर तपस्या की। अग्नि के बीच बैठकर, महीने में एक बार भोजन कर, उन्होंने वर्षों तक तप किया। जब ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने की बात मानी, तो यह शर्त रखी गई कि गंगा के वेग को केवल भगवान शिव ही संभाल सकते हैं।
यह सुनकर भगीरथ ने भगवान शिव की भी तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वचन दिया कि वे गंगा को अपने सिर पर धारण करेंगे। जब गंगा शिव के जटाओं में उतरीं, तो उन्होंने अपने वेग से पाताल तक जाने का प्रयास किया। इस पर शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में ही रोक लिया। कई वर्षों तक गंगा जटाओं में ही भटकती रहीं। भगीरथ ने पुनः शिव की तपस्या की, तब जाकर उन्होंने गंगा को मुक्त किया और बिंदु सरोवर में छोड़ा। वहां से गंगा सात धाराओं में बंटीं।