अंबेडकरनगर। दीपावली के पर्व पर घर-आंगन को रोशन करने के लिए कुम्हार समुदाय ने दीये और खिलौने बनाने शुरू कर दिए हैं। इस बार दीपावली में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ गई है। ऐसे में नगर पंचायत अशरफपुर किछौछा और आसपास के गांवों में दीये बनाने का काम जोरों पर हैं।
कुम्हारों का कहना है कि दीपावली उनके लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत का अवसर होता है। एक ओर जहां इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और चाइनीज सजावटी सामान ने बाजार में अपनी जगह बना रखी है, वहीं दूसरी ओर वोकल फॉर लोकल अभियान के बाद से लोगों का रुझान फिर से मिट्टी के दीयों की ओर लौट रहा है। अनेक युवा कारीगर अब पारंपरिक चाक को आधुनिक डिजाइन और रंगों के साथ जोड़ रहे हैं, जिससे दीयों को नया लुक मिल रहा है। कुम्हारों को इस उत्सव की तैयारी में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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पारंपरिक कारीगरों की आजीविका पर संकट
मनबोध प्रजापति का कहना है कि पहले जहां हर घर दीपावली पर मिट्टी के दीयों से रोशन होता था, अब उनकी जगह रंग-बिरंगी लाइटों ने ले ली है।
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तालाबों से मिट्टी निकालना बना चुनौती
केशव राम प्रजापति बताते हैं कि सरकारी तालाबों से मिट्टी निकालना अब आसान नहीं रह गया है। तालाबों से सटे खेतों के मालिक मिट्टी निकालने की अनुमति नहीं देते, जिससे काम प्रभावित हो रहा है।