अंबेडकरनगर। चिकित्सकों के न होने के चलते राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर में 16 जीवन रक्षक उपकरण (वेंटीलेटर) ठप पड़े हैं। गंभीर मरीजों को भर्ती करने के दौरान जब कृत्रिम सांस की सुविधा देने की जरूरत होती है तब ये उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद चिकित्सक व स्टॉफ के अभाव में मरीजों को लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि मरीजों को लखनऊ तक की दौड़ अनावश्यक ढंग से लगाने को विवश होना पड़ता है। कई बार यह स्थिति जानलेवा बन जाती है, लेकिन इसके बावजूद पर्याप्त स्टॉफ की तैनाती कर मरीजों की जान बचाने की सुध जिम्मेदारों को नहीं है।
यहां एमआरआई मशीन भी है, लेकिन इसका लाभ भी मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। साथ ही सीटी स्कैन जांच में रिपोर्ट मिल पाना भी संभव नहीं हो पा रहा है। मेडिकल कॉलेज की उपेक्षा का आलम यह है कि यहां चिकित्सकों के 55 पद पर तैनाती का इंतजार पूरा नहीं हो पा रहा है। 201 स्टॉफ नर्स तैनात न होने का खामियाजा भी मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। लंबे समय से चिकित्सक व पैरा मेडिकल स्टॉफ की तैनाती सुनिश्चित किए जाने की मांग मरीज व तीमारदार करते आ रहे, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर में मरीजों की तमाम उम्मीदें कदम दर कदम टूट रही हैं। जिले में जब राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई थी, तब न सिर्फ अंबेडकरनगर जनपद, वरन आसपास के भी जनपदों के मरीजों में भी नई उम्मीद जगी थी। हालांकि वक्त के थपेड़ों ने मेडिकल कॉलेज से जुड़ी उम्मीदों को तार तार कर डाला है। न तो यहां सुविधाएं बढ़ाने की सुध ली जा रही है और न ही स्टॉफ। लंबी कवायद के बाद अधूरे पड़े ज्यादातर निर्माण तो लगभग पूरे कर लिए गए हैं, लेकिन मरीजों को लाभ दिए जाने के मामले में हददर्जें की उपेक्षा हो रही है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मरीजों की जान बचाने तक के लिए उपलब्ध कराए गए उपकरणों को चालू करवाने में किसी की कोई रुचि नहीं है। यहां मेडिकल कॉलेज में 16 वेंटीलेटर हैं।
गंभीर किस्म के मरीजों को जब कृत्रिम सांस की जरूरत होती है, तो इस उपकरण के जरिए आक्सीजन गैस सिलेंडर के सहारे कृत्रिम सांस दी जाती है। यह उपकरण एक तरह से मरीजों के लिए मौत से लडने वाला साबित होता है। इसके बावजूद इस महत्वपूर्ण उपकरण का लाभ मरीजों को दिलवाने के लिए किसी जिम्मेदार को कोई परवाह नजर नहीं आती। नतीजा यह होता है कि जिन मरीजों को वेंटीलेटर जैसी सुविधा की जरूरत होती है, उन्हें रेफर कर देने की मजबूरी बन जाती है। ऐसे में मरीजों व तीमारदारों को लखनऊ तक की दौड़ लगाने के लिए विवश होना पड़ता है। इससे उनके समक्ष हर तरह की मुश्किलें और भी ज्यादा बढ़ जाती हैं, लेकिन इन मुश्किलों की परवाह उन सभी जिम्मेदारों को नहीं हो पा रही, जिन्हें होना चाहिए।
ऐसे हालात में कई बार मरीजों की जान तक चली जाती है। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशसन तक कोई भी इस बारे में प्रभावी पहल करता नहीं दिख रहा। इससे मरीजों को सस्ती व त्वरित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के दावे लगभग प्रतिदिन मेडिकल कॉलेज में तार तार हो रहे हैं। मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार, स्टॉफ के अभाव में वेंटीलेटर नहीं चल पा रहा है।
उनका कहना है कि वेंटीलेटर लगाया तो जा सकता है, लेकिन उसके लिए नियमित देखभाल करने को पर्याप्त स्टॉफ की जरूरत होती है। स्टॉफ न होने के चलते ही इन वेंटीलेटर का लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। इस बीच राजकीय मेडिकल कॉलेज के हालात यह हैं कि यहां स्टॉफ नर्स के 201 पद खाली पड़े हुए हैं। कुल 266 पद स्वीकृत हैं, लेकिन सिर्फ 65 पर ही तैनाती है। उधर चिकित्सकों के 104 पद स्वीकृत हैं, लेकिन मात्र 49 चिकित्सक ही तैनात हैं।
मेडिकल कॉलेज में एमआरआई की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन उसका लाभ मरीजों को आमतौर पर नहीं मिल पाता। गंभीर किस्म के वे मरीज जो यहां भर्ती होते हैं, उनकी जांच कभी कभार चिकित्सक कर लिया करते हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट न होने के चलते एमआरआई जांच का लाभ आमतौर पर मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। इस जांच के लिए मरीजों को दूरदराज के शहरों का चक्कर लगाने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ ऐसा ही हाल सीटी स्कैन का भी है। इसकी जांच तो हो जाती है, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट न होने से रिपोर्ट मिल पाना मरीजों के लिए संभव नहीं हो पाता।
जो संसाधन यहां उपलब्ध हैं, उनसे मरीजों का बेहतर उपचार किया जाता है। कोशिश होती है कि मरीजों की मुश्किलें गंभीरता से दूर की जाएं। - डॉ. मुकेश राना, सीएमएस