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बढ़ते खर्च से दम तोड़ रही दाना भूनने की परंपरा

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फोटो 3, अंबेडकरनगर के जलालपुर में दाना भुन कर अपने परिवार का खर्च चला रही महिला। - फोटो : AMBEDKAR NAGAR
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जलालपुर। आधुनिकता के चलते जहां पुराने रीति रिवाज विलुप्त होते जा रहे हैं, वहीं भूलापुर गांव के एक कोने में बसा एक परिवार लाई चना भूनने का काम कर अपनी जीविका चला रहा है। खेतों में पैदा हुए गेहूं, धान, चना, मटर को भूनते समय उठने वाली सोंधी सुगंध अब इक्का-दुक्का गांव में ही नजर आती है।
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आधुनिकता की इस चकाचौंध के बीच जलालपुर तहसील क्षेत्र की भूलापुर ग्राम पंचायत की प्रमिला देवी आज भी अपने पुश्तैनी धंधे से अपने चार छोटे बच्चों और स्वयं के पालन पोषण के लिए जूझ रही हैं। उन्होंने पुरानी परंपराओं को जीवित रखा हुआ है। इससे अक्सर लोगों को अपना बचपन याद आ जाता है। प्रमिला देवी जब भी गांव के लोगों को यह बताती हैं कि आज भुनाई करने के लिए भाड़ चालू होगा तो लोग अपने-अपने घरों से चावल, चना, मटर आदि लेकर उनके घर पहुंच जाते हैं।
वहां पर भाड़ की गरम रेत पर डाले गए अनाज के दाने गरमी पाकर कूदते हुए नृत्य जैसी लयबद्धता प्रकट करते हैं, वहीं भुनते अनाज की सोंधी-सोंधी खुशबू के साथ कुशलता से चलते श्रमजीवी महिला के हाथ पूरे माहौल को सम्मोहक बना देते हैं। खाने के शौकीनों के लिए भुने अनाज की ऐसी सोंधी महक और उसका देशी स्वाद किसी अजीम खजाने से कम नहीं।
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समय की अजीब विडंबना है कि पुरानी देशज परंपराओं को जीवित रख रही प्रमिला देवी महीने में दो तीन बार भाड़ जलाने के बाद भी ईंधन के मद में बढ़ोत्तरी होने के कारण बहुत थोड़े से रुपए ही बचा पाती हैं। पिछले छह सात साल से दाने की भुनाई कर के अपने परिवार का भरण पोषण भी कर रही प्रमिला देवी बताती हैं कि घटते लाभ और बढ़ती लागत तथा महंगाई के चलते दाने की भुनाई के कर बच्चों का पालन पोषण करना अब मुश्किल हो चला है।
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