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सरकारी कोल्ड स्टोर की एक यूनिट खराब

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अंबेडकरनगर। जिले में संचालित एकमात्र सरकारी शीतगृह अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है। 40 हजार क्विंटल क्षमता वाले इस शीतगृह में 20 हजार क्विंटल क्षमता वाला एक चैंबर करीब एक दशक से खराब है। इतनी ही क्षमता वाला मात्र एक चैंबर ही कार्य कर रहा है। नतीजा यह है कि आलू किसान विभिन्न क्षेत्रों में संचालित सात निजी शीतगृहों के मोहताज हैं। वहां कई बार उन्हें मनमानी का भी सामना करना पड़ता है।
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जिले के किसानों को आलू समेत अन्य कई अन्य प्रकार की उपज के भंडारण के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। दरअसल, जिले में सरकारी व्यवस्था के तहत भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं है। किसानों की उपज के भंडारण को लेकर जिम्मेदार लोग कितना गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले में आठ शीतगृह हैं, जिनमें मात्र एक ही सरकारी है। जिला मुख्यालय के अकबरपुर शहजादपुर में मालीपुर मार्ग पर स्थित 40 हजार क्विंटल क्षमता वाला यह सरकारी शीतगृह लंबे समय से विभिन्न प्रकार की अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है। यहां 20-20 हजार क्विंटल क्षमता के दो चैंबर हैं। इसमें से 20 हजार क्विंटल क्षमता वाला एक चैंबर करीब एक दशक से खराब है। ऐसे में मात्र एक ही चैंबर कार्य कर रहा है।
इसके चलते किसानों को आलू व अन्य उपज के भंडारण के लिए जिले के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित सात निजी शीतगृह मेसर्स अवध कोल्ड स्टोरेज प्राइवेट लिमिटेड रामनगर, अजय शीतालय बसखारी, गिरिधर कोल्ड स्टोरेज प्राइवेट लिमिटेड बसखारी, जनता कोल्ड स्टोरेज प्राइवेट लिमिटेड पुंथर टांडा, हाजी रमजान अब्दुल रऊफ यूनिट आसोपुर, साकेत कोल्ड स्टोरेज एवं आइस फैक्ट्री प्राइवेट लिमिटेड व मेसर्स सीता कोल्ड स्टोर मालीपुर की शरण लेने को मजबूर होना पड़ता है। इन प्राइवेट शीतगृहों में उन्हें सुविधाएं जरूर मिलती हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें सरकारी शीतगृह के सापेक्ष अधिक खर्च करना पड़ता है। इससे आर्थिक चपत लगती है। कई बार इन निजी कोल्ड स्टोरज में किसानों को कई तरह की मनमानी का भी सामना करना पड़ जाता है।
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अकबरपुर के किसान बाबूराम वर्मा व जियाराम ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकारी कोल्ड स्टोर में किसानों बजाए ेआढ़तियों को प्राथमिकता दी जाती है। भंडारण फुल होने से पहले ही किसानों को वापस कर दिया जाता है जबकि मार्च माह तक आढ़तियों का आलू ले लिया जाता है। इसके अलावा किसानों के आलू की पलटाई का कार्य नहीं किया जाता है जबकि आढ़तियों के आलू को समय-समय पर पलटाया जाता है। इसके लिए उन्हें आढ़तियों से अधिक धनराशि मिलती है। साथ ही उन्हें नजदीकी मंडी में पहुंचाने की भी सुविधा मिलती है। मरथुआ सरैया के गयादीन पाण्डेय व नरेंद्र सिंह ने कहा कि समुचित व्यवस्था न होने से किसानों का मोह सरकारी शीतगृह से भंग हो चुका है। ऐसे में उन्हें अधिक राशि देकर प्राइवेट शीतगृह तक जाने को मजबूर होना पड़ता है।
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