अंबेडकरनगर। अकबरपुर के मानिकपुर में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन सोमवार को भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया गया। प्रवाचक जगजीवनानंद ने कहा कि वास्तविक अर्थों में धनवान वही व्यक्ति है, जो अपने तन, मन और धन से सेवा और भक्ति करता है। परमात्मा की प्राप्ति केवल सच्चे प्रेम और समर्पण से ही संभव है।
भक्ति दिखावे या बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि आचरण और कर्म से सिद्ध होती है। माता यशोदा ने पंचगव्य और गोमूत्र से कृष्ण को स्नान कराया। इस प्रसंग के माध्यम से कथा व्यास ने गौ सेवा, गायत्री जाप और गीता पाठ के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गौ सेवा से अनेक देवी-देवताओं की सेवा का फल प्राप्त होता है। भगवान अपने भक्तों की भावना और कर्म को विशेष महत्व देते हैं। जिन भक्तों ने स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया है, वे उन्हें अत्यंत प्रिय हैं। भगवान स्वयं भक्तों की चरणरज को अपने हृदय में धारण करते हैं। गोपबालकों की शिकायत पर माता यशोदा ने कृष्ण से मुख खोलने को कहा। मुख खुलते ही यशोदा ने उसमें संपूर्ण सृष्टि का दर्शन किया। आकाश, दिशाएं, पर्वत, समुद्र, ग्रह-नक्षत्र, पंचतत्व, इंद्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, काल और कर्म तक दिखाई दिए। यह दृश्य माता के लिए विस्मयकारी था। यदि माता यशोदा को यह ज्ञान स्थायी रूप से बना रहता, तो बाल लीला संभव नहीं होती। इसी उद्देश्य से माता यशोदा उस अनुभव को विस्मृत कर देती हैं और वात्सल्य भाव पुनः स्थापित हो जाता है। धर्म और संस्कार का ज्ञान पुस्तकों और आचरण दोनों से आता है। अहंकार का त्याग और कर्तव्य का पालन जीवन को संतुलित बनाता है। भक्ति में ज्ञान और वात्सल्य का संतुलन आवश्यक है। इस दौरान राजीव उपाध्याय, पप्पू सिंह, करिया, हिमांशु, प्रेम नारायण, बाल गोविंद, अंगद व अन्य उपस्थित रहे।