गांव में शव पहुंचे तो लोग रो पड़े।
- फोटो : amar ujala
सामाजिक बहिष्कार तक की बातें होने लगीं
भाई सैफी, चाचा ताज मोहम्मद समेत परिवार के अन्य लोगों ने अन्य परिजनों ने साफ कह दिया कि वे इस कलंक को अपने साथ नहीं जोड़ सकते। आसपास के लोगों में भी आक्रोश इतना था कि जिसने भी अंतिम संस्कार की हिम्मत दिखाई, उसके सामाजिक बहिष्कार तक की बातें होने लगीं।
यह सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि समाज का कठोर निर्णय भी था। आखिरकार पुलिस के समझाने-बुझाने पर देर रात परिजन शव लेने को राजी तो हुए लेकिन उसे घर तक लाना भी मुनासिब नहीं समझा। जैसे वह पहले ही उनके दिलों से दफन हो चुका हो।
वारदात से परिजन बदहवास हैं।
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शिवाला घाट पर दफनाया
पोस्टमार्टम हाउस से सीधे शहजादपुर के इमामबाग कब्रिस्तान ले जाया गया लेकिन उसे यहां भी जगह नहीं मिली। मानो जमीन का एक टुकड़ा भी उसे स्वीकार करने को तैयार न हो। अंततः पुलिस की मौजूदगी में जौहरडीह शिवाला घाट पर उसे दफनाया गया।
बिना किसी रस्म, बिना किसी दुआ- फातिहा और बिना किसी आखिरी विदाई के। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ गलतियां सिर्फ जिंदगी ही नहीं छीनतीं, बल्कि मौत के बाद मिलने वाली इज्जत भी खत्म कर देती हैं। आमिर की कहानी इसी दर्दनाक सच्चाई की एक मिसाल बन गई है।