ऐसे सेनानियों की याद में संबंधित क्षेत्र में प्रतिमा तो लगा दी गई है, लेकिन उनकी सुध लेने तक की जरूरत नहीं समझी जाती है।सेनानियों की इस प्रकार की उपेक्षा को लेकर लोगों में नाराजगी व्याप्त है। उनका कहना है कि जिन्होंने हमें आजादी दिलाई, उनकी इस प्रकार से उपेक्षा सही नहीं है।
अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने व आजादी के विभिन्न आंदोलन में जिले से भी बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया था। कोई खेती किसानी छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूदा, तो किसी ने सरकारी नौकरी को ठोकर मारते हुए देश को आजाद कराने की ठान ली। इनमें डा. गणेश कृष्ण जेतली, राजबली यादव, वसुधा सिंह, डा. राममनोहर लोहिया, कालेदीन, भगवती प्रसाद वर्मा के नाम मुख्य रूप से शामिल हैं।
इनमें डा. जेतली ने महज इसलिए नौकरी को ठोकर मार दी थी कि जिस चिकित्सालय में वह नौकरी करते थे, वहां अछूतों का इलाज करने से इंकार कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने त्यागपत्र देते हुए आजादी की जंग में महात्मा गांधी से प्रेरित होकर कूद पड़े थे।
इन सेनानियों ने देश को आजाद कराने के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था। घर परिवार छोड़कर अंग्रेजों से सिर्फ इसलिए मोर्चा संभाल रहे थे कि आने वाली पीढ़ी आजाद हिंदुस्तान में सांस ले सके।
हालांकि मौजूदा समय में इन सेनानियों को पूरी तरह से बिसार दिया गया है। इन सेनानियों के निधन के बाद उनकी प्रतिमा तो जगह जगह स्थापित कर दी गई, लेकिन उसकी कभी सुध लेने की जरूरत नहीं समझी गई। चाहे वह डा. जेतली व राजबली हो या फिर वसुधा सिंह।