राजेसुल्तानपुर (अंबेडकरनगर)। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल अहिरौली रानीमऊ का भवन स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर के बगैर ही खंडहर में बदल गया। करीब साढ़े 4 दशक पहले करीब साढ़े 3 लाख की लागत से बना यह भवन देखरेख के अभाव में जर्जर हो गया है। उदासीनता का आलम यह कि अस्पताल आज भी किराए के भवन में चल रहा है। 6 वर्ष से चिकित्सक का पद भी रिक्त पड़ा है। फार्मासिस्ट के भरोसे ही अस्पताल किसी तरह से संचालित हो रहा है। विभागीय उदासीनता का आलम यह है कि यह अस्पताल अब अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।
करीब साढ़े चार दशक पहले आयुर्वेदिक अस्पताल अहिरौली रानीमऊ को लेकर जो उम्मीद जगी थी, वह अब टूट चुकी है। विभागीय उदासीनता का आलम यह कि वर्ष 1972 में करीब साढ़े तीन लाख रुपये की लागत से गांव में चार अस्पताल भवन का निर्माण आरईएस विभाग ने पूरा किया। यह बात अलग है कि तकनीकी कारणों व विभागीय उदसीनता के चलते यह भवन आज तक स्वास्थ्य विभाग के नाम हैंडओवर नहीं हो पाया। नतीजा यह हुआ कि देखरेख के अभाव में लाखों की लागत से यह भवन मौजूदा समय में जर्जर हो चुका है। विभागीय उदासीनता के चलते आज भी आयुर्वेदिक अस्पताल किराए के भवन में ही चल रहा है। विभागीय उदासीनता का ही परिणाम है कि वर्ष 2000 तक जहां मरीजों की संख्या अस्पताल में प्रतिदिन 150 से 200 थी, वहीं अब 10 से 20 मरीज ही अस्पताल पहुंचते हैं। करीब 6 वर्ष से अस्पताल चिकित्सक विहीन है। फार्मासिस्ट के भरोस ही संचालित हो रहा है।
अस्पताल की इस दुर्दशा से अहिरौली रानीमऊ, मुबारकपुर अंजन, सेमरा, गढ़वल, महारमपुर, दशवतपुर इटहिया, कियामपुर, सिकरौरा, शंकरपुर, मदैनिया सहित आस पास के दर्जनों गांव के लोगों को आयुर्वेद पद्घति की बेहतर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल रही है। जबकि इस अस्पताल से लगभग 30 हजार की आबादी को बेहतर चिकित्सा सुविधा का लाभ दिया जा सकता है। इसके बावजूद विभागीय अधिकारी अस्पताल की बेहतरी के लिए ध्यान नहीं दे रहे हैं। फार्मासिस्ट नरेंद्र का कहना है कि उपलब्ध संसाधनों में मरीजों को बेहतर सुविधाओं का लाभ दिया जा रहा है।
मामले में की जाएगी छानबीन
मामला काफी पुराना हो चुका है। भवन बनने के बाद हैंडओवर क्यों नहीं हुआ इस बारे में आवश्यक छानबीन करायी जाएगी। विभाग गुणवत्ता के साथ ही समय से निर्माण कार्य पूरा करने के लिए कटिबद्ध है। -एसके गुप्त, अधिशाषी अभियंता आरईएस