अंबेडकरनगर। जिले में शहर से लेकर गांव तक के 50 परिषदीय स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई शुरू कराने को विभाग ने मजाक बनाकर रख डाला है। न तो अंग्रेजी की पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं और न ही 40 विद्यालयों में फर्नीचर उपलब्ध कराए जा सके हैं। 100 सहायक अध्यापकों की भी तैनाती अभी इन विद्यालयों में पद के सापेक्ष नहीं हो सकी है। ऐसे में पंजीकृत लगभग आठ हजार छात्र-छात्राओं को अंग्रेजी की शिक्षा कैसे मिल पा रही होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं।
दर्जा अंग्रेजी माध्यम का, पढ़ाई हिंदी माध्यम की पुस्तकों से
गौरतलब है कि दो परिषदीय स्कूल जिले में पहले से ही अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के लिए चयनित किए जा चुके थे। इस वर्ष 50 नए विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के लिए चयनित किया गया। अंग्रेजी के जानकार अध्यापकों की काउंसलिंग के बाद उनकी तैनाती का भी क्रम शुरू हुआ। हालांकि इसमें पूरी सफलता नहीं मिली। नियमानुसार प्रधानाध्यापक के अलावा प्रत्येक विद्यालय में चार सहायक अध्यापक की तैनाती होनी चाहिए, लेकिन इन सभी 50 विद्यालयों में दो-दो सहायक अध्यापकों की तैनाती अभी नहीं हो पाई है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन विद्यालयों में अब तक अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें ही उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं। जिला मुख्यालय तक ही अभी यह पुस्तकें नहीं पाई हैं। नतीजा यह है कि पुरानी हिंदी मीडियम की पुस्तकों से ही काम चलाना पड़ रहा है। 50 विद्यालयों में से सिर्फ 10 में ही फर्नीचर की व्यवस्था हो सकी है। ऐसे में शेष 40 विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के छात्र-छात्राओं को टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है। कई विद्यालयों में तो विद्युतीकरण नहीं है। ऐसे में बच्चों के सामनेे पसीने से तरबतर होकर पढ़ने की विवशता बनी हुई है। आने वाले दिनों में तेज गर्मी के बीच इस परिस्थिति में बच्चों के बीमार पड़ जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
किसी विद्यालय में चहारदीवारी क्षतिग्रस्त तो, कहीं प्लास्टर व विद्युत वायरिंग उखड़ रही है। ज्यादातर विद्यालयों के शौचालय अभी भी बदहाली का शिकार हैं। कान्वेंट स्कूलों को टक्कर देने का माहौल बनाने के लिए विद्यालय परिसरों में आकर्षक पौधों का रोपण नहीं किया जा सका है। कई जगहों पर शुद्ध पेयजल का भी टोटा बना हुआ है। कुल मिलाकर अंग्रेजी माध्यम के लिए चयनित 50 विद्यालयों में हड़बड़ी में पढ़ाई तो शुरू करा दी गई, लेकिन सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। अब ऐसे में जाहिर तौर पर इन सबका खामियाजा उन छात्र छात्राओं को ही भुगतना पड़ेगा, जिन्होंने अपना पंजीयन यहां बेहतर शिक्षा के लिए करा रखा है।