क्रियायोग पर आधारित सनातन धर्म का मूलमंत्र समादर है। सनातन संस्कृति किसी के अनादर की सीख नहीं देती। न्याय की अवधारणा में अनादर सबसे बड़ा अन्याय है। ऐसे में सत्य अहिंसा और निष्ठा परआधारित न्याय ही समाज के लिएवरदान साबित हो सकता है। क्रियायोग आश्रम परिसर में गांधी प्रतिमा के समक्ष शनिवार को ''''सनातन धर्म और न्याय की अवधारणा'''' विषयक परिचर्चा में यह बातें क्रियायोग की वैज्ञानिक प्रविधि के आध्यात्मिक गुरु स्वामी योगी सत्यम ने कही।
गांधी प्रतिमा के समक्ष नमन के साथ स्वामी योगी सत्यम ने सनातन धर्म में न्याय की अवधारणा पर विस्तार से रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म में न्याय प्रणाली धर्म और सत्य के आधार पर समाज में व्यवस्था और संतुलन स्थापित करने पर केंद्रित है। इसमें महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्यनिष्ठा और न्यायोचित व्यवहार को महत्व दिया जाता है। सनातन संस्कृति में धर्म को न्याय का आधार माना जाता है। न्याय को धर्म की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। उन्होंने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण के संदर्भ में कहा कि सनातन धर्म सिखाता है कि हमें कभी किसी का अनादर नहीं करना चाहिए।
यह सबसे बड़ा सामाजिक अन्याय है। गांधी के मार्ग पर चलकर हम इस तरह के अवमूल्यन से समाज और व्यवस्था दोनों को बचा सकते हैं। सनातन धर्म में अहिंसा को सबसे महत्वपूर्ण धर्म माना जाता है, जो सभी प्राणियों के प्रति दया और प्रेम का प्रतीक है। इसी तरह सनातन में सत्य को सबसे महत्वपूर्ण मूल्य माना गया है, जो न्याय और सत्यनिष्ठा का हमेशा आधार रहा है। इस लाइव सेशन से यू-ट्यूब के जरिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, स्टिजरलैंड समेत दुनिया के 119 देशों के अनुयायी और सनातन प्रेमी जुड़े रहे।