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Prayagraj : असाधारण हालातों के सिवा नामांतरण आदेशों के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं

Tue, 06 Jan 2026 01:17 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में नामांतरण (म्यूटेशन) आदेश के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट तभी सीधे हस्तक्षेप कर सकता है, जब कोई असाधारण हालात हो।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में नामांतरण (म्यूटेशन) आदेश के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट तभी सीधे हस्तक्षेप कर सकता है, जब कोई असाधारण हालात हो। भूमि स्वामित्व विवादों का अंतिम निर्णय सिविल अदालतों के क्षेत्राधिकार में ही आता है।

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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति डॉ.योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने बस्ती निवासी गंगाराम मिश्रा की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि म्यूटेशन की कार्यवाही केवल राजस्व रिकॉर्ड के लिए होती है। इससे न तो स्वामित्व तय होता है और न ही अधिकार सृजित होते हैं। मामला एक कृषि भूमि से जुड़ा था, जहां पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर प्रतिवादी का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया।

याची का दावा है कि बिक्री उसके हिस्से से की गई है, जबकि उसके पक्ष में वसीयत भी मौजूद है। कोर्ट ने कहा कि म्यूटेशन की कार्यवाही सारांश प्रकृति की होती है। इसका उद्देश्य केवल यह देखना होता है कि किससे भूमि राजस्व वसूला जाएगा। ऐसे मामलों में स्वामित्व, उत्तराधिकार, वसीयत या बिक्री विलेख की वैधता जैसे जटिल प्रश्नों का निर्णय नहीं किया जा सकता। इन विवादों का समाधान केवल सक्षम सिविल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है।
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब याची के पास वैकल्पिक विधिक उपचार उपलब्ध हो और सिविल वाद लंबित हो, तब हाईकोर्ट को रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए। म्यूटेशन आदेशों में हस्तक्षेप केवल उन्हीं मामलों में संभव है, जहां आदेश पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर, धोखाधड़ी से प्राप्त, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन में पारित या किसी सक्षम अदालत की ओर से पहले से तय अधिकारों के विपरीत हो। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि याची अपने अधिकारों के निर्धारण के लिए सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है।

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