बची-खुची हरियाली पिछले कुछ सालों में जमीन और सड़कों के चौड़ीकरण, पक्की टाइल्स और पत्थर के पार्कों में चली गई। पेड़ों की जगह बिजली, टेलीफोन के खंभों, मोबाइल टावर्स, बहुमंज़िली इमारतों ने ले ली। इंसान ने बढ़ती आबादी के लिए तो जगह बनाई, लेकिन जाने कितने पशु-पक्षी इसके चलते बेघर हो गए और उनका दाना-पानी छिन गया। बताते हैं कि गौरैया की घटती संख्या की एक बड़ी वजह इंसान के खानों में खाद्य व यूरिया का अधिक प्रयोग होना भी है। क्योंकि गौरैया इंसानों के साथ रहने के अलावा उनका भोजन भी ग्रहण करती है।
ऐसे में इस प्रकार का भोजन करने से उनके प्रजनन की क्षमता प्रभावित हो रही है। तीसरा कारण मोबाइल टावर का अधिक संख्या में लगना माना जा रहा है। क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क में आने के कारण यह अपने रहने का स्थान भूल जाती है और घोंसले में न लौटने के कारण भी इनकी मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से भी गौरैया की प्रजनन क्षमता कमजोर हो रही है।
गौरैया न केवल बगीचों और घरों को जीवंत बनाती है, बल्कि यह जैव विविधता को भी बनाए रखती है। इसके गायब हो जाने से पर्यावरणीय असंतुलन की आशंका बढ़ जाती है। इससे कीटों की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है और फसलों को नुकसान हो सकता है। - प्रोफेसर केपी सिंह, जंतु विज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय।
गौरैया के संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाता है। इसके अलावा गौरैया के घोसले व दाना-पानी के लिए बर्तनों का भी वितरण समय-समय पर किया जाता है। - महावीर यादव, डीएफओ, वन विभाग।