बी-वेनम और प्रोपोलिस पर शोध
शहद के अलावा मधुमक्खियों से मिलने वाले प्रोपोलिस और बी-वेनम (जहर) पर भी शोध चल रहा है। इनके डंक में मौजूद विशेष केमिकल्स का उपयोग भविष्य में कई बड़ी बीमारियों की दवाइयां और एंटीबायोटिक्स के विकल्प तैयार करने में किया जा रहा है।
ग्रामीण रोजगार का बड़ा जरिया
मौनपालन ग्रामीण भारत में रोजगार सृजन का बड़ा जरिया बन चुका है। आंकड़ों के अनुसार, देश में 20 करोड़ से अधिक मधुमक्खी कॉलोनियों की क्षमता मौजूद है, जो 60 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों और बेरोजगार युवाओं को कम लागत में आजीविका प्रदान कर सकती है।
बहुउपयोगी बी-वैक्स के लाभ
शहद निष्कर्षण के बाद प्राप्त होने वाला बी-वैक्स (मोम) औषधीय और औद्योगिक रूप से बेहद कीमती है। इसमें मौजूद एंटी-माइक्रोबियल गुणों के कारण इसका उपयोग त्वचा संक्रमण, जलने के घावों को ठीक करने, सौंदर्य प्रसाधनों (लिप बाम, क्रीम) और प्रदूषण-मुक्त मोमबत्तियां बनाने में प्रमुखता से होता है।
परागण चक्र और नेस्टिंग बिहेवियर
मकरंद इकट्ठा करते समय मधुमक्खियां नर पौधे के परागकण को अनजाने में मादा पौधे के स्टिग्मा पर गिरा देती हैं, जिससे फूल फल में बदल जाता है। सामान्य मधुमक्खियों से अलग कई जंगली प्रजातियां सॉइल नेस्टिंग करती हैं यानी मिट्टी के भीतर सुरंगें बनाकर रहती हैं।
ऑस्ट्रेलिया तक सीमित है मधुमक्खियों का सातवां स्टेनोट्रिटिडे परिवार
वैश्विक स्तर पर मौजूद मधुमक्खियों के सात प्रमुख परिवारों में से छह परिवार भारत में मिलते हैं। इनमें कोलेटिडे परिवार की 518 प्रजातियों में से 15 भारत में दर्ज हैं। हालांकि, आदिम और अत्यंत दुर्लभ माना जाने वाला सातवां परिवार स्टेनोट्रिटिडे भारत में नहीं पाया जाता। यह पूरी तरह ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप तक सीमित है।
मधुमक्खियों अस्तित्व पर मंडराते बड़े खतरे
वर्तमान में मधुमक्खियां पांच बड़े खतरों कीटनाशक, मोनोकल्चर (एक ही तरह की खेती), हैबिटैट लॉस (आवास का नुकसान), पैथोजन स्प्रेड (व्यावसायिक बीमारियां) और क्लाइमेट चेंज से जूझ रही हैं। एकल खेती के कारण विशिष्ट पौधों पर निर्भर रहने वाली मधुमक्खियों को भोजन नहीं मिल पाता है।
संरक्षण के लिए व्यावहारिक उपाय
मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए केमिकल फ्री वातावरण को बढ़ावा देना होगा। इसके प्रयोग के तौर पर इविवि परिसर में पेड़ों पर पांच आर्टिफिशियल नेस्ट (कृत्रिम घोंसले) लगाए गए हैं। साथ ही, मिट्टी में घोंसला बनाने वाली मक्खियों की रक्षा और जागरूकता बढ़ाने के लिए बी-वॉलंटियर्स की टीमें तैयार करने की सख्त आवश्यकता है।