गेहूं की कम पैदावार न सिर्फ किसानों, बल्कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाखों कार्डधारकों के लिए भी मुसीबत का सबब बन सकती है। कम उत्पादन और बाजार में अच्छा मूल्य मिलने के कारण किसान क्रय केंद्रों तक जाने को तैयार नहीं हैं। सरकार यह अच्छी तरह से जानती है कि गेहूं की खरीद लक्ष्य के अनुरूप नहीं हुई तो खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गेहूं वितरण पर संकट आ जाएगा।
इलाहाबाद जिले में गेहूं खरीद का लक्ष्य पांच हजार मीट्रिक टन निर्धारित किया गया है जबकि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत जिले में पात्र परिवारों की संख्या दस लाख से ऊपर पहुंच गई है। परिवार के प्रत्येक सदस्य (यूनिट) के हिसाब से साढ़े तीन किलो गेहूं दिए जाने का प्रावधान है। अधिनियम में प्रावधान है कि प्रति यूनिट के हिसाब से कोटेदारों को खाद्यान्न वितरण के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा। अगर मान लें कि हर परिवार में औसतन दो सदस्यों को भी खाद्य सुरक्षा अधिनियम का लाभ मिल रहा है तो साल भर में तकरीबन 8400 मीट्रिक टन गेहूं की जरूरत पड़ेगी जबकि जिले में गेहूं खरीद का लक्ष्य पांच हजार मीट्रिक टन निर्धारित किया गया है।
अगर ऐसे में लक्ष्य का पचास फीसदी गेहूं भी नहीं खरीदा जा सका तो खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर संकट तय है। अफसर अब दबाव में हैं कि खरीद का लक्ष्य कैसे पूरा करें। गांव-गांव कांटा और बोला लेकर गेहूं खरीदने निकले के अफसर अब तक 1200 मीट्रिक टन गेहूं की खरीद कर सके हैं। सूखे से सिर्फ इलाहाबाद नहीं, यूपी सहित दूसरे प्रदेश भी जूझ रहे हैं। किसान क्रय केंद्रों तक जाने को तैयार नहीं हैं और गेहूं बाजार में बेच रहे हैं। छोटे किसानों को इस बार सिर्फ इतना गेहूं मिला कि परिवार का पेट भर सकें और बहुत किसान इससे भी वंचित रह गए। ऐसे में आने वाले समय में गेहूं की उपलब्ध को लेकर संकट बढ़ सकता है और इसका असर गेहूं के मूल्य पर भी पड़ेगा।