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मलमास में किस जल से महादेव का अभिषेक

Sat, 06 Jun 2015 02:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। मोझदायिनी गंगा में जल के नाम पर नाले का पानी बह रहा है। निर्मल गंगा की हकीकत यह है कि जिस गंगाजल को लुटिया या किसी पात्र में महीनों, वर्षों पूजापाठ के लिए रखते हैं, उसमें नालों के पानी के मिलने से जबर्दस्त प्रदूषण और दुर्गंध है।  कई घाटों पर तो इसी प्रदूषण के कारण श्रद्धालु भी डुबकी लगाने से कतराते हैं। तकरीबन दस दिनों बाद मलमास और फिर भोले के माह सावन की शुरुआत होगी।
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इस दौरान दारागंज स्थित दशाश्वमेध घाट से ही गंगा जल लेकर श्रद्धालु अभिषेक करते हैं लेकिन वर्तमान में गंगा की जो स्थिति है उससे भोले बाबा गंगा जल से नहीं बल्कि ‘नालों के जल’ से ही नहाएंगे। नमामि गंगे योजना के नाम पर गंगा को प्रदूषणमुक्त और स्वच्छ करने का वादा करने वाली केंद्र सरकार ने एक वर्ष बाद भी इसके लिए कोई कदम नहीं उठाया है। और तो और स्थानीय स्तर पर गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई भी गंगा को लेकर गंभीर नहीं है।

बमरौली से लेकर संगम तक गंगा की स्थिति बेहद खराब है। फाफामऊ पुल के पास से दारागंज तक गंगा नाले सरीखी नजर आने लगी हैं। गंगा जल कम होने नदी में बीच-बीच में टीले बन गए हैं। यहां गंगा सिर्फ नाले के पानी से ही प्रवाहमान है। बमरौली से लेकर दारागंज के बीच 22 बड़े-छोटे नालों का पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। यह हाल तब है जब इस बीच पोंगहट, मेंहदौरी और बख्शी बांध पर एसटीपी हैं। शहर के बड़े हिस्से का गंदा पानी इन तीन एसटीपी के जरिए ही गंगा में जाता है लेकिन गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के अफसरों और एसटीपी का संचालन कर रही कंपनियों की लापरवाही के कारण बड़ी मात्रा में नाले का जहरीला पानी बिना ट्रीटमेंट के ही गंगा में छोड़ दिया जाता है।
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यह काम रात में चोरी-छिपे होता है। इसकी वजह से गंगा में फाफामऊ से लेकर संगम तक बीओडी की मात्रा में पांच-छह मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जबकि स्नानयोग्य जल में बीओडी की मात्रा तीन मिलीग्राम प्रतिलीटर के आसपास होनी चाहिए।

गंगा दशहरा के जैसे-तैसे बीतने के बाद अब 17 जून से शुरू होने वाले अधिक आषाढ़ शुक्ल पक्ष (मलमास) के साथ महादेव को जल चढ़ाने के लिए गंगा किनारे श्रद्धालुओं का जमावड़ा शुरू होगा। दारागंज के दशाश्वमेध घाट पर तो गंगा जल की स्थिति बेहद खराब है। नाले के पानी से गंगाजल काला हो गया है और उससे भीषण दुर्गंध उठ रही है। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, इस पर रोक लगाने में पूरी तरह नाकाम हैं। हालांकि इकाई के महाप्रबंधक अजेय रस्तोगी हो या परियोजना प्रबंधक जेपी मणि, गंगा में प्रदूषण को लेकर जब भी महापौर, पार्षदों या आम लोगों आवाज उठाई, हर बार इन अफसरों ने नालों को टेप कर एसटीपी से जोड़ने और गंगा की स्वच्छता की बात कही लेकिन हुआ आज तक कुछ नहीं।
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