कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी पर सोमवार को भगवान श्रीहरि विष्णु नींद से जागे तो मांगलिक कार्यों के लिए भी अनुमति मिली। घरों में पूजा अनुष्ठान के बीच ‘दारिद्रय’ को घरों से दूर भगाने की परंपरा का निर्वाह किया गया। पर्व पर बलुआघाट सहित यमुना के विभिन्न घाटों पर डुबकी लगाने और आरती, दीपदान के लिए भी लोग जुटे। घरों में तुलसी के चौरे पर पूजा अर्चना की गई।
परंपरा के मुताबिक घरों में भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा की गई। भोर से पहले गन्ने के अग्रभाग से थाली या सूप को पीटते हुए ‘ईश्वर आवें, दरिद्दर जाएं’ कहकर दारिद्रय को भगाया गया।
जानसेनगंज स्थित शहर के अन्य विष्णु मंदिरों में मंगलगीतों के साथ रात्रि जागरण करते हुए भगवान विष्णु की आराधना की गई। पूर्व संध्या पर घर के आंगन में चावल के एपन से विष्णुचक्र बनाया गया। एपन से ही दो लकीरें बनाते हुए घर के प्रत्येक कमरे में ले जायी गईं।
पूजन के बाद विष्णु चक्र पर ऋतुफल और पूजा सामग्री रखकर जिस सूप या थाली से उसे ढका गया था, दारिद्रय को भगाने के लिए उसी का उपयोग किया गया था। शहर के अलग-अलग बाजारों में सुबह से ही ईख की बिक्री होती रही।
फिर जले दीप, आतिशबाजी
प्रयागराज। देवोत्थान एकादशी पर एक बार फिर दीपावली जैसी ही जगमग और खुशियां रहीं। शाम को दीप जलाकर पूजा के बाद दीपों से घर सजाए गए। बाद में जमकर आतिशबाजी की गई।