उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ.अनिल यादव ने दो अप्रैल-2013 को पदभार ग्रहण किया था। महज दो वर्षों के कार्यकाल में दो दर्जन विवादों से उनका नाता जुड़ गया। यहां तक कि उनकी नियुक्ति पर ही लगातार सवाल उठते रहे। डॉ. अनिल इससे पहले आयोग में छह साल सदस्य भी रहे और लगातार इस बात पर विवाद होता रहा कि उनकी नियुक्ति नियमों को दरकिनार कर हुई।
डॉ. अनिल यादव की कार्यशैली पर तो कई गंभीर आरोप लगते रहे हैं। उन पर खास वर्ग और क्षेत्र के लोगों को तवज्जों देने का भी गंभीर आरोप है। पीसीएस-2011 समेत कई भर्तियों को आधार बनाकर प्रतियोगी न्यायालय में भी जा चुके हैं। साक्षात्कार पैनल, पेपर सेटिंग, मूल्यांकन में भी नियमों को दिरकिनार कर एक खास क्षेत्र के लोगों को शामिल करने का आरोप है। आयोग की इस बदनामी के कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ज्यादातर वरिष्ठ शिक्षकों ने आयोग के साक्षात्कार पैनल में शामिल होने और मूल्यांकन से मना कर दिया है। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने तो यह आरोप भी लगाए कि आयोग में उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता।
आयोग के अध्यक्ष पर अफसरों और कर्मचारियों के साथ तानाशाही रवैया अपनाने का भी आरोप है। कर्मचारियों का कहना है कि वे खुलकर अपनी बात भी रख नहीं सकते। उदाहरण सामने है, जब आयोग की भर्तियों में हुई धांधली और अध्यक्ष के खिलाफ बोलने पर चार कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।
डॉ. अनिल यादव के कार्यकाल के दौरान आयोग में पहली बार ऐसा हुआ, जब इंटरव्यू पैनल में शामिल विषय विशेषज्ञ नाराज होकर चले गए और इसके बावजूद साक्षात्कार प्रक्रिया जारी रखी गई। राजकीय महाविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिए आयोजित साक्षात्कार के लिए बीएचयू के प्रोफेसर चौथीराम और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर मुश्ताक अहमद को बतौर विषय विशेषज्ञ पैनल शामिल किया गया था। आरोप है कि आयोग के सदस्य ने उनके साथ बदसलूकी की। इसके विरोध में दोनों विशेषज्ञ बिना इंटरव्यू लिए वापस चल गए। इसके बावजूद साक्षात्कार प्रक्रिया नहीं रोकी गई। इंटरव्यू जारी रखने के लिए एक्सपर्ट अचानक कहां से पहुंच गए, यह सवाल भी बना हुआ है।