इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा के 26 साल पुराने बहुचर्चित जमील प्रधान हत्याकांड में उम्रकैद पाए फारुख और फीमा की सजा पर मुहर लग दी है। कोर्ट ने कहा दिनदहाड़े हुई वारदात पर चश्मदीदों की अचूक गवाही से संदेह की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं।
यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने सुनाया है। बांदा सत्र न्यायालय ने चश्मदीद गवाहों के बयानों पर भरोसा करते हुए 2005 में दोनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों दोषियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
यह खूनी वारदात 25 नवंबर 2002 को दोपहर लगभग दो बजे बांदा के छावनी चौराहे पर हुई थी। गोयरा गांव के तत्कालीन प्रधान जमील खान अपने भाइयों के साथ अनाज का सौदा कर दिलहागंज से लौट रहे थे। तभी रंजिश को लेकर घात लगाए बैठे गांव के ही फारुख और फीमा मोटरसाइकिल से वहां पहुंचे। दोनों ने अवैध देसी पिस्तौलों से जमील पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। छाती और बांह में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल जमील की अगले दिन कानपुर के अस्पताल में मौत हो गई थी।