कई याचियों ने कट ऑफ मार्क्स बढ़ाने के 7 जनवरी के शासनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचियों की दलील थी कि लिखित परीक्षा होने के बाद क्वालीफाइंग मार्क्स तय करना कानून की मंशा के खिलाफ है।
इन परीक्षाओं में कम तो हमारा कटऑफ ज्यादा क्यों?
- जूनियर हाईस्कूल के 5364 पदों पर सहायक शिक्षक भर्ती के लिए करवाई परीक्षा में कट ऑफ 40 व 30 प्रतिशत रखे गए।
- यूपी सिविल सेक्रेटिरिएट में रिव्यू ऑफिसर व सहायक रिव्यू ऑफिसर के 465 पदों के लिए भी कट ऑफ 40 व 30 प्रतिशत रखा गया।
- निचली अदालतों में सहायक अभियोजन अधिकारी के 17 पदों के लिए कट ऑफ 40 व 30 प्रतिशत रखा गया।
- पीसीएसजे की 610 भर्तियों में भी यही कट ऑफ था।
- यूपी हायर ज्यूडिशल सर्विसेज की 37 सीटों के लिए कट ऑफ 45 व 40 प्रतिशत रखा गया।
सरकार की दलीलें-गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने के लिए बढ़ाए कट ऑफ मार्क्स
सरकार ने अपने फैसले को जायज ठहराते हुए तर्क दिया था कि शिक्षा के मामले में वह मेरिट से समझौता नहीं कर सकती। अदालत को यह भी बताया गया था कि सरकार की मंशा गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने की है और इसके लिए अच्छे अध्यापकों की आवश्यकता है। इसी वजह से क्वालीफाइंग मार्क्स बढ़ाए गए।
पिछली परीक्षा में 1.4 लाख अभ्यर्थी तो इस बार 4.1 लाख
सरकार की ओर से कहा गया कि पिछली सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा में 1.4 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे। वहीं इस बार 4.1 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए हैं। यह एक वजह है कि कट ऑफ अधिक रखी गई है। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे तवज्जो नहीं दी।
शिक्षामित्रों को बाहर करने के लिए बढ़ाया कट ऑफ
हाईकोर्ट ने कहा कि, सरकार को कट ऑफ सीधे 20 प्रतिशत क्यों बढ़ानी पड़ गई, यह बात समझ से बाहर है। चूंकि इस परीक्षा में बीएड पास अभ्यर्थी भी शामिल हुए हैं, ऐसे में यह लगता है कि सरकार ने यह कट ऑफ शिक्षामित्रों को चयन से बाहर करने के लिए बढ़ाया है। अगर सरकार का उद्देश्य यही है तो यह समानता के अधिकार के खिलाफ है।
शिक्षामित्रों का दूसरा और आखिरी मौका खत्म नहीं किया जाना चाहिए था
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 25 जुलाई 2017 के आदेश के तहत शिक्षामित्रों को लगातार दो परीक्षाओं में शामिल होने का अवसर दिया गया था। यह आखिरी अवसर था। सरकार इसे अपनी मनमानी से खत्म नहीं कर सकती थी। उसने किन्हीं और वजहों से कट ऑफ को बढ़ाया जो गलत था।
कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर 24 घंटे में शासनादेश भी निकाल दिया?
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरह से सरकार ने सात जनवरी 2019 का शासनादेश जारी किया वह कानून के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। सचिव बेसिक शिक्षा ने पांच जनवरी को सरकार को पत्र लिख कर कट ऑफ अंक तय करने की गुजारिश की और 24 घंटे में सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करके शासनादेश भी जारी कर दिया गया।
संविधान का उल्लंघन है शासनादेश
यह भी सामने आया है कि विशेष सचिव शिक्षा अनुभाग-चार ने बेसिक शिक्षा सचिव के निवेदन पर शासनादेश जारी किया, जबकि वे इसके लिए पात्र नहीं हैं। इसे कैबिनेट के बीच नहीं रखा गया जो संविधान का उल्लंघन है। ऐसे में इसे शासनादेश या शासन का निर्णय भी नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह केवल विशेष सचिव द्वारा जारी पत्र है।
जल्दबाजी की जरूरत क्या थी?
सरकारी वकील ने हाईकोर्ट में माना कि जल्द में शासनादेश जारी हुआ, लेकिन यह भी कहा कि इसके लिए सभी प्रक्रिया का पालन हुआ है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि उनके पास उस 24 घंटे के समस्त रिकॉर्ड हैं जो बताते हैं कि शासनादेश को किस प्रकार जारी किया गया। इस जल्दबाजी की वजह समझ नहीं आती।
खेल के बाद नियम बदले गए
हाईकोर्ट ने कहा कि सराकार के कट ऑफ संबंधित आदेश का अधिकतर अभ्यर्थियों को भी पता नहीं चला। यह बताता है कि खेल के बाद खेल के नियम बदले गए। योग्यता के कट ऑफ मार्क्स परीक्षा से पहले जारी होते हैं, इसे परीक्षा के बाद लागू नहीं किया जा सकता।
69 हजार सहायक शिक्षकों के लिए आयोजित यह भर्ती परीक्षा छह जनवरी 2019 को आयोजित की गई थी। इसे लेकर एक साथ 99 याचिकाओं के जरिए हजारों शिक्षामित्र अभ्यर्थियों ने सात जनवरी 2019 को जारी शासनादेश को चुनौती दी थी।
बेसिक शिक्षा विभाग के विशेष सचिव द्वारा जारी इस शासनादेश में परीक्षा के सामान्य वर्ग के लिए 65 और आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत अंक अनिवार्य कर दिए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एक दिसंबर 2018 को जारी शासनादेश और 5 दिसंबर को जारी परीक्षा के नोटिफिकेशन में इस प्रकार के कोई कटऑफ अंक निर्धारित नहीं किए गए थे। यानी सरकार परिणाम जारी करने के लिए कोई और तरीका सोच रही थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से 93 वकील
सुनवाई के दौरान 93 वकील याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में पेश हुए। वहीं सरकार और विभिन्न विभागों के लिए तीन सरकारी वकील व बाकी प्रतिवादियों की ओर से नौ वकील शामिल हुए।