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हाईकोर्ट का अहम फैसला : बुजुर्ग की जान-माल को खतरा हो तो बेटे-बहू को घर से बेदखल कर सकता है ट्रिब्यूनल

Fri, 11 Sep 2026 01:55 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग की जान-माल की सुरक्षा के लिए जरूरी हो तो वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल बेटे या अन्य रिश्तेदार को घर से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग की जान-माल की सुरक्षा के लिए जरूरी हो तो वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल बेटे या अन्य रिश्तेदार को घर से बेदखल करने का आदेश दे सकता है। हालांकि, यह शक्ति असीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल परिस्थितियों के अनुसार अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाना चाहिए।

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यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कानपुर नगर निवासी श्यामजी शुक्ला की याचिका पर दिया। मामला यशोदानगर के मकान नंबर-34, पी ब्लॉक से जुड़ा है। याची ने मकान को अपनी स्वअर्जित संपत्ति बताते हुए आरोप लगाया था कि बेटे और बहू के व्यवहार से उसे परेशानी हो रही है। ऐसे में उसे और संपत्ति को खतरा है। याची ने माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007 की धारा 05 और 22 के तहत एसडीएम/संयुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र देकर बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने की मांग की थी।

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ट्रिब्यूनल ने कहा था कि बेदखल करने की शक्ति उसके पास नहीं

ट्रिब्यूनल ने 13 जनवरी 2026 को याची की जान और संपत्ति की सुरक्षा के लिए पुलिस को आदेश तो दिया पर बेटे-बहू को मकान से बेदखल करने से इन्कार कर दिया था। कहा था कि उसके पास यह शक्ति नहीं है। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस दृष्टिकोण को सही नहीं माना। कहा कि ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होने पर बेदखली का आदेश देने की शक्ति है।

हालांकि, बेदखली तभी की जा सकती है, जब यह साबित हो कि वरिष्ठ नागरिक के जीवन और अंगों की सुरक्षा के लिए ऐसा करना आवश्यक और उचित है। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को मामले की दोबारा सुनवाई करने का आदेश दिया। वहीं, बहू के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मामला लंबित होने के कारण हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले के परिणाम की प्रतीक्षा की जाए। 
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