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High Court : ट्रायल के दौरान आरोप में बदलाव ट्रायल कोर्ट का अधिकार, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

Sat, 09 May 2026 01:19 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान आरोप में बदलाव, आरोपी या शिकायकर्ता का नहीं बल्कि ट्रायल कोर्ट का अधिकार है। पक्षकारों की मांग अक्सर मुकदमे को लंबा खींचती है या कार्यवाही में बाधा डालती है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने कानपुर देहात के प्रवीण पाल की याचिका खारिज कर दी।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान आरोप में बदलाव, आरोपी या शिकायकर्ता का नहीं बल्कि ट्रायल कोर्ट का अधिकार है। पक्षकारों की मांग अक्सर मुकदमे को लंबा खींचती है या कार्यवाही में बाधा डालती है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने कानपुर देहात के प्रवीण पाल की याचिका खारिज कर दी।

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याची पर नाबालिग से दुष्कर्म का आरोप था। हाईस्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार घटना के समय पीड़िता बालिग थी। इस कारण याची ने ट्रायल कोर्ट से पॉक्सो और आईपीसी की धारा 376(3) हटाने की मांग की। जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस पर याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट साक्ष्य को देखते हुए तय करे कि आरोप सही है या नहीं। यह उसका क्षेत्राधिकार है। यदि आरोप तय होने के बाद न्यायालय को लगता है कि कोई चूक हुई है तो वह निर्णय सुनाने से पहले कभी भी बदलाव कर सकता है।

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