संगम क्षेत्र स्थित खाक चौक व्यवस्था के जमीन आवंटन से पहले भूमि पूजन किया गया।
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दलदल वाली भूमि को लेकर पैदा हुई संतों की नाराजगी
सतुआ बाबा ने मेला प्रशासन पर आरोप लगाते हुए नाराजगी जताई कि साधु-संतों को दूर और दलदल वाली भूमि दी जा रही है, जबकि सामाजिक संस्थाओं को अपेक्षाकृत ऊंची और सुरक्षित जमीनें आवंटित होती रही हैं। उनका कहना है कि धार्मिक परंपरा को बनाए रखने के लिए संतों की बसावट ऐसी जगह होनी चाहिए जहां उनके प्रवचन, भंडारा और साधना में कोई बाधा न आए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मेला प्रशासन साधु-संतों को दलदल में जमीन देना चाहता है। ऐसा हम होने नहीं देंगे। आवश्यकता पड़ी तो मुख्यमंत्री को भी साधु-संतों की पीड़ा से अवगत कराएंगे।
प्रयागवाल के गंगा पूजन कार्यक्रम में महंत यमुना पुरी, महंत बलवीर गिरी, नीरज त्रिपाठी और वैभव करवरिया
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हर वर्ष दोहराता विवाद - आस्था बनाम व्यवस्था
सतुआ बाबा और मेला प्रशासन के बीच यह विवाद नया नहीं है। भूमि आवंटन को लेकर पहले से ही खींचतान होती आई है। हर बार की तरह इस बार भी संवाद के बाद समाधान निकल पाया। हालांकि संतों का आरोप है कि उन्हें मिलने वाली जमीन का बड़ा हिस्सा दलदली है, जिससे शिविर लगाने में कठिनाई आती है। इस बार 300 बीघा भूमि की मांग ने विवाद और बढ़ा दिया, जबकि मेला प्रशासन कुल 185- 200 बीघा में 275-300 संस्थाओं की व्यवस्था करता रहा है।
भूमि पूजन ने दी धार्मिक शांति का संदेश
हालांकि विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन भूमि पूजन के बाद वातावरण में धार्मिक शांति और मेला तैयारियों की गति पुनः सामान्य दिखाई दी। खाक चौक के साधु-संतों, मेला अधिकारी ऋषिराज, अपर मेलाधिकारी दयानंद प्रसाद व अन्य अधिकारियों की उपस्थिति में संपन्न भूमि पूजन से यह संकेत मिला कि माघ मेला की परंपरा, आस्था और संतों की तप-परंपरा को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि अंतिम आवंटन के बाद संतों की चिंताओं का कितना समाधान होता है और माघ मेला अपनी गरिमा और पवित्रता के साथ सुचारु रूप से संपन्न होता है।
महावीर मार्ग होते मनसैता तक खाक चौक को जमीन दिए जाने पर सहमति बन गई है। सतुआ बाबा ने विधिवत भूमि पूजन भी कर लिया है। - ऋषिराज, मेला अधिकारी