इलाहाबाद। अंग्रेजों ने भले ही 68 साल पहले देश छोड़ दिया, मगर अंग्रेजियत का असर आज भी हावी है। अमीरों और गरीबों के बीच की खाईं बढ़ती जा रही है। संवैधानिक संस्थाओं की मनोदशा 1947 के पहले जैसी ही बनी हुई है। सामाजिक समस्याएं और जटिल होती जा रही हैं। स्वतंत्रता दिवस पर जब विशेषज्ञों से बात की गई तो थोड़ी-बहुत संतुष्टि जताते हुए मौजूदा हालात पर कई सवाल उठाए। उनका कहना है कि राजनीतिक स्वतंत्रता भले ही लोगों को समझ में आ रही हो लेकिन आर्थिक आजादी की दरकार अब भी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ मनोविज्ञानी आरसी त्रिपाठी कहते हैं कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंग्रेजों के जमाने में स्थापित शैक्षणिक संस्थाओं की मनोवृत्ति वैसी ही बनी हुई है। शैक्षणिक, संवैधानिक संस्थानों के नियम-कानून वैसे की काम कर रहे हैं। आज जरूरत है कि शैक्षणिक, संवैधानिक संस्थाओं को देश की जरूरत के अनुरूप नए तरीके से स्थापित किया जाए। पुराने ढर्रे पर चलते रहे तो व्यवस्थाएं चौपट हो जाएंगी। झूंसी स्थित गोविंद वल्लभ पंत संस्थान के डायरेक्टर एवं अर्थशास्त्री प्रो. प्रदीप भार्गव कहते हैं समाज के कुछ ऐसे उच्चवर्ग के लोग जिनके पास संवैधानिक व्यवस्थाओं को संचालित करने की ताकत है, सिर्फ वही 68वीं वर्षगांठ लुत्फ उठाएंगे।
कहा कि जो लोग बाजार की फिलॉसफी में यकीन रखते हैं, उनके लिए तो यह स्वर्ण युग है लेकिन देश की अधिकांश जनता जो मेहनतकश है, खेती पर निर्भर है, कर्ज लेकर अपना काम कर रही है, उनके लिए अच्छे दिन नहीं है। वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ. हेमलता श्रीवास्तव के मुताबिक राजनैतिक स्वतंत्रता, स्वच्छंदता तो लोगों को मिली लेकिन जिस तरह से पश्चिमी देशों का अनुकरण चल रहा है, उससे सामाजिक दायरे बिखरते जा रहे हैं। देश की आजादी के वर्ष बीतने के साथ समाज में महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं।