- इविवि की एनआईआरएफ रैंकिंग के लिए भी यह शोध काफी मददगार होगा। पिछले कुछ वर्षों से इविवि की रैंकिंग लगातार गिर रही है। रैंकिंग निर्धारण में संस्थान को किसी शोध के पेटेंट के अच्छे-खासे अंक प्रदान किए जाते हैं। इविवि में शोध तो लगतार हो रहे हैं, लेकिन उनमें पेटेंट बहुत कम होते हैं।
कोरोना काल में जब विश्वविद्यालयों में पढ़ाई बंद थी, प्रयोगशालाओं में ताले लगे थे और छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे थे, तब इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के बायोकेमेस्ट्री विभाग की प्रयोगशाला में एक ऐसा शोध चल रहा था, जो सबसे अलग था। वहां थ्री-डी मास्क तैयार किया जा रहा था। आठ से नौ माह की मेहनत के बाद शोध सफल रहा और अब थ्री-डी मास्क के पेटेंट की स्वीकृति भी मिल गई है। खास यह कि एंटी कोरोना थ्री-डी मास्क को इस तरह से डिजाइन किया गया है, जिससे आंखें भी सुरक्षित रहेंगी।
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बायोकेमेस्ट्री विभाग के शिक्षक डॉ. मुनीश कुमार के नेतृत्व में थ्री-डी टेक्नोलॉजी से तैयार किए गए मास्क की डिजाइन काफी आकर्षक है। मास्क को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि उसमें आंखों को सुरक्षित रखने के लिए ग्लास को फिट किया जा सकता है। कोरोना से बचने के लिए लोग मास्क साथ अलग से शील्ड पहनते हैं, जिससे काफी गर्मी महसूस होती है। ऐसे में गर्मी के मौसम में थ्री-डी मास्क से काफी राहत मिलेगी।
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सांस लेने में दिक्कत न हो, सो मास्क में फिल्टर भी लगाया गया है। डॉ. मुनीश कुमार ने बताया कि एंटी कोरोना थ्री-डी मास्क को कोलकाता ऑफिस से पेटेंट की स्वीकृति मिल गई है। कुछ दिनों बाद यह गजट में प्रकाशित होगा। इसके बाद अगर कोई एजेंसी या कंपनी संपर्क करती है तो उसे थ्री-डी टेक्नोलॉजी से बने एंटी कोरोना मास्क की डिजाइन सौंपी जा सकती है।
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डॉ. मुनीश के अनुसार कोरोना काल में प्रयोगशालाएं खाली थीं और कोर्स से संबंधित शोध भी कम हो रहे थे। ऐसे में खाली समय का सदुपयोग किया गया। थ्री-डी टेक्नोलॉजी, कंप्यूटर ग्राफिक्स आदि के इस्तेमाल से एंटी कोरोना मास्क तैयार किया गया। इसमें आठ से नौ महीने लग गए। इसे बनाने में इविवि के डीन रिसर्च एंड डेवपलमेंट और बायोकेमेस्ट्री विभाग के प्रो. एसआई रिजवी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इसके साथ ही शोध में नारायण ट्रांसलेशन रिसर्च सेंटर, नारायण मेडिकल कॉलेज नेल्लोर के डॉ. सिवा कुमार, बायोकेमेस्ट्री विभाग के डॉ. ऋषभ कुमार, डॉ. शंभु शरण त्रिपाठी, इविवि के मानव विज्ञान विभाग के डॉ. शैलेंद्र कुमार मिश्र और पांडुचेरी के डॉ. पी. कार्थिगेयन का भी योगदान रहा।