अदालतों में रोज सैकड़ों फाइलें खुलती हैं, बहस होती है और फिर वे रिकॉर्ड रूम का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जो फाइलों से निकलकर दिल में जगह बना लेते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप कुमार के लिए एक ऐसा ही मामला आज भी एक टीस बनकर मौजूद है।
50 वर्षों से वकालत कर रहे प्रदीप कुमार बताते हैं कि एक महिला और उसकी बेटी को भरण-पोषण के बकाए के रूप में करीब 25 लाख रुपये मिलने थे। उम्मीद थी कि यह धनराशि उनके जीवन को कुछ राहत देगी लेकिन कानूनी प्रक्रिया की लंबी राह उनके सामने दीवार बनकर खड़ी हो गई।
महिला के पति ने हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल कर दी। इसके बाद मामला कानूनी दांव-पेचों में उलझ गया। जल्द रुपये दिलाने के लिए प्रयास करता रहा। इसी बीच महिला की बेटी एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गई। परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। जिस धनराशि का इंतजार था, वह समय पर नहीं मिल सकी। इलाज प्रभावित हुआ और आखिरकार बेटी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह घटना मेरे जीवन के लिए एक टीस बन गई है। लोग कहते हैं कि वकील को पूरी तरह पेशेवर होना चाहिए, लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जो फाइल से निकलकर दिल में बस जाते हैं। यह मामला उनमें से एक है। आज भी सोचता हूं कि काश, उस परिवार को उसका हक समय पर मिल गया होता।
उनका मानना है कि न्याय केवल फैसला सुनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। फैसलों का समय पर अनुपालन भी उतना ही जरूरी है। कई बार न्याय में हुई देरी किसी परिवार से उसकी सबसे बड़ी पूंजी, उसकी उम्मीद छीन लेती है।