हर साल गांवों के विकास के लिए सरकार अरबों रुपये का बजट देती है। पिछले वर्षों की तुलना में इस बार बजट और बढ़ा दिया गया। हर गांव के खाते में कम से कम 80 लाख रुपये आ रहे हैं। हालांकि इस बार के प्रधानी चुनाव में जिस तरह से धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल हुआ, उसे देखने के बाद यही सवाल उठ रहे हैं कि गांवों की नवनिर्वाचित सरकार इस रकम से पहले गांव का विकास करेगी या अपना चुनावी खर्च निकालेगी।
किसी भी गांव के सालाना विकास के लिए 80 लाख रुपये मिलना बड़ी बात है। केंद्र सरकार ने बजट में गांवों के विकास के लिए इतनी रकम जारी करने का एलान कर दिया है कि हर गांव के हिस्से 80 लाख रुपये आ रहे हैं। तकरीबन 50 फीसदी गांवों में अन्य केंद्र एवं प्रदेश सरकार की अन्य योजनाओं के तहत काफी काम कराया जा चुका है। ऐसे में सवाल उठा रहे हैं कि नए बजट में जारी रकम का उपयोग आखिर कहां और कैसे होगी। सवाल उठ रहे हैं कि हमेशा की तरह कहीं इस बार भी बजट की बंदरबांट न हो जाए। कहने को पारदर्शिता के लिए सरकार ने भले ही ज्यादातर योजनाओं के तहत भुगतान की प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी हो लेकिन घपला करने वाले कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं। इस बार भी तैयारी पूरी है।
पौधरोपण के लिए कम से कम एक लाख रुपये मिलेंगे। प्रावधान है कि 70 फीसदी फलदार और 30 फीसदी छायादार पौधे लगाए जाएंगे। अनुपात पलट भी गया तो कौन देखता है। पौधे लगने के कुछ दिन बाद उसे गाय और बकरी उसे चर जाएं तो बड़ी बात नहीं। पौधरोपण के बाद अक्सर ऐसी घटनाएं होती हैं। यानी घोटाले के ढेरों रास्ते हैं। ऐसे तमाम गांव हैं, जहां पिछले दो-तीन महीनों में नई सड़कें बनकर तैयार हुई हैं। उदारहण के तौर पर सरकारी दस्तावेजों में कोई सड़क ‘अ’ के घर से ‘ब’ के घर तो कोई सड़क ‘क’ के घर से ‘ख’ के घर तक बनाई गई। हैरत नहीं अगर नए बजट में यही सड़क ‘ब’ के घर से ‘अ’ के घर तक और दूसरी सड़क ‘ख’ के घर से ‘के’ घर तक बना दी जाए। यानी सड़क वही रहेगी लेकिन दस्तावेजों में स्थान का नाम आगे-पीछे हो जाएगा। सड़क पर ईंट दोयम दर्जे की लगी तो भी कोई बोलने वाला नहीं। ऐसे में घोटाले और कमाई का सिलसिला बेरोकटोक जारी रहता है।
गांवों में तालाब भी खोदवाए जाने हैं। साथ ही मनरेगा के तहत अन्य कई कार्य भी कराए जाने हैं। कहने को मजदूरी का पैसा सीधे जॉब कार्ड धारकों के खाते में आता है। इसमें भी खेल होता है। सूत्रों के मुताबिक ज्यादातर कार्डधारक संबंधित प्रधान के रिश्तेदार या करीबी होते हैं। तालाब जेबीसी से खोदवा दिए जाते हैं। अन्य कार्य भी ऐसे मजदूरों से कराए जाते हैं, जिनके जॉब कार्ड नहीं बनाए गए और उन्हें एक चौथाई मजदूरी देकर चलता कर दिया जाता है। पैसा जब प्रधानों के रिश्तेदारों या करीबियों के खाते में आता है तो उसका बड़ा हिस्सा प्रधान रखते हैं और कुछ हिस्सा जॉब कार्डधारकों को दे दिया जाता है ताकि वे अपना मुंह बंद रखें और घोटाला बदस्तूर जारी रहे।