रंगमंच के मंच से शुरू हुआ सफर, नुक्कड़ नाटकों और रामलीला के किरदारों से होता हुआ अब बड़े पर्दे तक पहुंच गया है। प्रयागराज के पुराना कटरा निवासी अभिनेता गौतम त्रिपाठी ने करीब नौ साल तक थिएटर की दुनिया में अभिनय की बारीकियां सीखीं और संघर्ष के दौर से गुजरते हुए फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई। फिल्म ‘हनुमान अंश’ में बाबा के भक्त राधेश्याम के किरदार ने उन्हें वह पहचान दिलाई जिसका इंतजार उन्हें वर्षों से था। गौतम कहते हैं कि कैमरे पर दिखने वाली उनकी कुछ मिनटों की भूमिका के पीछे वर्षों की मेहनत, सीख और रंगमंच का अनुभव है। प्रयागराज आए गौतम ने अमर उजाला के लिए संवाद न्यूज एजेंसी से बातचीत में थिएटर से फिल्मों तक के अपने सफर, संघर्ष और प्रयागराज के रंगमंच की चुनौतियों पर बात की। संवाद
थिएटर से फिल्मों तक आपका सफर कैसे शुरू हुआ?
करीब नौ साल पहले एक थिएटर वर्कशॉप से मेरी यात्रा शुरू हुई। शुरुआत में खुद भरोसा नहीं था कि मैं अभिनय कर पाऊंगा, लेकिन धीरे-धीरे लगा कि यही मेरा रास्ता है। इसके बाद समानांतर संस्था से जुड़कर चार-पांच साल रंगमंच किया। श्री बाल रामलीला कमेटी में जगदीश बंधु के सानिध्य में रामलीला की बारीकियां सीखीं और भरत व श्रवण जैसे किरदार निभाए।
फिल्मों में पहला मौका कब मिला?
वर्ष 2019 में फिल्म ‘शादी में जरूर आना’ में एक छोटा सा किरदार मिला था। इसके बाद विज्ञापनों, डॉक्यूमेंट्री, टीवी और वेब प्रोजेक्ट्स में काम किया। मुंबई में रहते हुए लगातार ऑडिशन देता रहा और अभिनय सीखता रहा।
‘हनुमान अंश’ में राधेश्याम का किरदार कैसे मिला?
उस समय मैं मुंबई में था। चित्रकूट में फिल्म की शूटिंग चल रही थी। एक दोस्त ने कहा कि अपना ऑडिशन भेजो। मैंने प्रोफाइल भेजा, फिर स्क्रिप्ट मिली और ऑडिशन के बाद मेरा चयन हो गया। फिल्म में मेरा स्क्रीन टाइम भले ही तीन-चार मिनट का है लेकिन राधेश्याम का किरदार काफी महत्वपूर्ण है। खासकर ‘सांप-सांप’ वाला सीन दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रहा।
इस किरदार ने आपके कॅरिअर में क्या बदलाव लाया?
एक अभिनेता बहुत काम करता है लेकिन कोई एक किरदार उसे अलग पहचान दिला देता है। मेरे लिए राधेश्याम वही किरदार है। आज लोग मुझे इस किरदार के नाम से पहचान रहे हैं। जब सोशल मीडिया पर लोग लिखते हैं कि मैं प्रयागराज का गौरव हूं तो बहुत खुशी होती है।
शूटिंग के दौरान कोई ऐसा अनुभव रहा, जिसे आप खास या चमत्कारिक मानते हैं?
जब पहली बार शूटिंग के लिए चित्रकूट पहुंचा तो रात करीब डेढ़ बजे सड़क पर 20 से 25 में बंदर दिखाई दिए। अगले दिन शूटिंग लोकेशन जाते समय एक जगह सैकड़ों लंगूर दिखे। मैं इसे अपने लिए एक खास अनुभव मानता हूं। फिल्म की शूटिंग के दौरान भी नीब करौरी बाबा की कुटिया के सेट पर एक लंगूर के लगातार आता रहा जो फिल्म में एक-दो जगह दिखाई देता है। मेरी व्यक्तिगत आस्था है कि यह सब हनुमान और बाबा का आशीर्वाद था। फिल्म की सफलता के बाद इन अनुभवों को और भी खास महसूस करता हूं।
थिएटर ने फिल्मों में अभिनय करने में कितनी मदद की?
मैंने जो कुछ भी सीखा है, थिएटर से ही सीखा है। दो हजार से ढाई हजार नुक्कड़ नाटक और 15-16 थिएटर प्ले किए हैं। थिएटर और सिनेमा की तकनीक अलग है। थिएटर में अभिनय थोड़ा खुला होता है जबकि कैमरे के सामने बहुत बारीकी से काम करना पड़ता है। कैमरा छोटी से छोटी चीज पकड़ लेता है।
प्रयागराज के रंगमंच को लेकर आप क्या सोचते हैं?
प्रयागराज के रंगमंच ने मुझे बहुत कुछ दिया है। यहां प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन आज छोटे समूहों के लिए नाटक करना मुश्किल होता जा रहा है। हॉल और मंच की सुविधाओं पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। प्रयागराज साहित्य और संस्कृति का शहर है इसलिए यहां का रंगमंच कमजोर नहीं होना चाहिए।
अभिनय के क्षेत्र में आने वाले युवाओं के लिए आपका संदेश?
संघर्ष से मत घबराइए। मेहनत, धैर्य और मन की सच्चाई बहुत जरूरी है। सफलता में समय लग सकता है लेकिन अगर तैयारी और मेहनत ईमानदार है तो एक दिन अवसर जरूर मिलता है।