साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार मंगलेश डबराल के निधन से शहर में शोक व्याप्त हो गया। साहित्यकारों का कहना है कि उनके निधन से साहित्य जगत में जो खालीपन आ गया, उसकी भरपाई शायद ही हो पाए। वे जितने महान कवि थे, उतने ही अच्छे एक इंसान भी थे।
हिंदी की आधुनिक कविता के शीर्ष रचनाकारों में से एक रहे मंगलेश का प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) से खासा जुड़ाव था।
उन्होंने संगमनगरी से ही अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत की। मंगलेश इलाहाबाद व लखनऊ से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र अमृत प्रभात से जुड़े रहे। उनकी कविताओं में सामंती बोध होने के साथ-साथ पूंजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार झलकता था। मंगलेश की कविताओं का अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, इतालवी, पुर्तगाली समेत कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। वे साहित्य के साथ-साथ संगीत के भी अच्छे जानकार थे। शहर के पुराने काफी हाउस में साहित्यकारों के साथ उनकी नियमित बैठक होती थी, जिसमें समसामयिक मुद्दों पर चर्चा होती थी।
हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम दिया
वर्ष 2020 बीतते बीतते एक बलि और ले गया। विगत आठवें-नौवें दशक मे उभरी हम जैसों की पीढ़ी का एक प्रतिनिधि कवि हमसे बिछुड़ गया। मंगलेश डबराल! वे दिन याद आ रहे हैं, जब मंगलेश इलाहाबाद में हमलोगों के बीच थे। ‘अमृत प्रभात’ में संपादकीय विभाग से जुड़कर उन्होंने उसे हिंदी पत्रकारिता का एक प्रतिमानात्मक स्वरूप दिया था। हमारी मित्रमंडली में नीलाभ, मंगलेश और वीरेन डंगवाल की त्रयी का होना रचनात्मक उत्साह का अजस्र उत्प्रेरक जैसा था। उन्हीं दिनों हमारे कथाकार मित्र सतीश जमाली ने प्रकाशन का काम शुरू किया था।
मंगलेश ने अपने पहले कविता संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ की पांडुलिपि इलाहाबाद में ही तैयार कर ली थी और सतीश जमाली उसे चित्रलेखा प्रकाशन से छापना चाहते थे। तय हुआ था कि दो कविता संग्रह एकसाथ प्रकाशित होंगे एक मंगलेश का ‘पहाड़ पर लालटेन’ और दूसरा राजेंद्र कुमार का ‘ऋ ण गुणा ऋण’ । यह बात सन् 1977 की है। लेकिन तभी अमृत प्रभात का एक संस्करण लखनऊ से निकलना शुरू हुआ और मंगलेश लखनऊ च़ले गए। फिर वहां से दिल्ली ‘जनसत्ता’ में । बहरहाल उनके पहला संग्रह से जमाली वंचित रह गए। मंगलेश दिल्ली के हुए पर न वो हम जैसे इलाहाबादियों को भूले और न हम उन्हें।
प्रोफेसर राजेंद्र कुमार