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समय से पूछेगा साहित्य, न होना दूधनाथ का

Sat, 13 Jan 2018 01:51 AM IST
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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‘हमारी चंद तस्वीरें कहीं महफूज कर लीजै, सवाल उठ्ठेगा मुस्तक़बिल में आखिर आदमी क्या था’, जी हां, हिंदी कथा के अमर शिल्पी दूधनाथ सिंह के न होने के बाद साहित्य, समय से बार-बार उनके होने का सवाल पूछेगा, बताएगा आदमी क्या था। उनके जाने के साथ साहित्य का सूनापन और गहरा गया है। किसी भी सभा, संगोष्ठी, समारोह में उनकी सार्थक उपस्थिति आयोजन की गरिमा की गारंटी होती थी। वह अपनी पीढ़ी के रचनाकारों में अत्यंत मुखर, प्रखर तो थे ही, नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए किसी अभिभावक से कम नहीं थे। उम्र के फासले को मिटाकर नए से नए रचनाकारों, छात्रों, शिष्यों के बीच वह जिस सहजता से घुल-मिल जाते थे, वैसा दुर्लभ है।
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विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से लेकर हिंदी विश्वविद्यालय, हिंदुस्तानी एकेडमी, निराला सभागार, हिंदी साहित्य सम्मेलन या फिर सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले किसी आयोजन सहित कॉफी हाउस, एजी ऑफिस के नींबू चाय अड्डे या फिर कचहरी में पेड़ के नीच धरना देते दूधनाथ को आसानी से देखा जा सकता था। कथा, कविता, लेख, प्रकाशन सहित किसी भी साहित्यिक गतिविधि में उनका सहज, स्वाभाविक लेकिन सार्थक हस्तक्षेप होता था। उनकी मौजूदगी किसी सघन वृक्ष की तरह थी, जिसकी छांव में इत्मिनान से सुस्ताते हुए बोला-बतियाया जा सकता था।

वह गद्य लेखन के जितने अद्भुत रचनाकार थे, अपनों के बीच उतने ही जिंदादिल और खिलंदड़। शौक ऐसा कि मन हुआ तो रसगुल्ला खाने को रात दस बजे गाड़ी निकालकर संग रह रहे विवेक को लेकर नई बस्ती, झूंसी से सुलाकी तक आने के लिए तनिक भी नहीं सोचते थे। निकल पड़ते थे। हमेशा संवाद के पक्षधर रहे दूधनाथ ने लेखक संघों के मतभेदों को भी बखूबी और सहजता से दूर किया। मुक्तिबोध को याद करने वाले दूधनाथ के ‘अंत:करण का आयतन’ भी बहुत बड़ा था। हर समय वह भीतर ही भीतर कहानी और पात्रों की तलाश में जुटे होते थे।
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परिणाम की परवाह किए बगैर, बिना लागलपेट अपनी बात क हते हुए दूधनाथ आजीवन अभिव्यक्ति के खतरे उठाते रहे। वह एक अच्छे लेखक और अच्छे व्यक्ति तो थे ही, अच्छे शिक्षक भी थे, जिनके पास शिष्यों की निष्ठावान और समर्पित फौज थी। परंपरा के साथ अधुनातन बोध रखने वाले दूधनाथ तमाम यादों से भरा ‘झोला’ छोड़कर विदा हो गए, फिर कभी न आने के लिए लेकिन जो जीते जी इलाहाबाद से दूर नहीं होना चाहता था, वह जाने के बाद भी कहां जाएगा।
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