कानूनी सहायता के अभाव में जेलों में पड़े कैदियों की हालत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। अफसोस जताते हुए कहा कि राष्ट्र आज़ादी का अमृत काल मना रहा है लेकिन, नागरिकों का एक वर्ग ‘जेलों की अंधेरी दीवारों’ के पीछे गुमनाम जीवन जी रहा है। क्योंकि, वहां सांविधानिक स्वतंत्रता की रोशनी नहीं पहुंच रही है।
इस तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत ने हत्या के आरोप में 14 साल से सजा काट रहे बुलंदशहर के रामू की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। इसी तरह के मामले से जुड़ीं नौ अन्य जमानत याचिकाओं पर भी कोर्ट ने सुनवाई की। कोर्ट ने सरकार को विधिक सहायता के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के बहुत से मामले हैं, जिसमें कैदियों की जमानत याचिकाएं ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। क्योंकि, मामले पर बहस करने या शीघ्र सुनवाई का कोई प्रयास नहीं किया गया। कुछ में इन कैदियों का अपने वकीलों से कोई संपर्क नहीं है, जिससे उन्हें जमानत अर्जियों की स्थिति के बारे में पता चले। संवाद
अदालतें न बनें मूकदर्शक
कोर्ट ने कहा कि इन आवाजहीन कैदियों का भाग्य व्यवस्था पर एक मौन दोषारोपण है। न्यायालयों का यह सर्वोच्च कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि आपराधिक कार्यवाही में उपस्थित होने वाले कैदियों को कानूनी सहायता प्राप्त हो और वे मूकदर्शक बने न रहें। कानूनी सहायता से इन्कार करने से निष्पक्ष, उचित और न्यायसंगत प्रक्रिया का उल्लंघन, अनुचित कारावास और स्वतंत्रता में कटौती होती है।
कोर्ट ने दिए सुझाव
1-डिजिटल प्लेटफॉर्म का करें प्रयोग
आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहले से उपलब्ध डाटा को विभिन्न प्रासंगिक तथ्यों, विवरणों को शामिल करने के लिए समेकित और उन्नत किया जा सकता है। इस तरह के डिजिटल बुनियादी ढांचे/आईटी प्लेटफॉर्म ट्रायल कोर्ट, डीएलएसए और जेल अधिकारियों की क्षमता को बढ़ाएंगे। ताकि, कैदियों को कानूनी सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया को कुशल तरीके से पूरा किया जा सके।
जरूरतमंद कैदी का बनाए रिकॉर्ड
डीएलएसए के संबंध में न्यायालय ने आदेश दिया कि वे प्रत्येक कैदी का रिकॉर्ड बनाए रखें। इसमें कानूनी सहायता के लिए कैदी की आवश्यकता निर्धारित करने और सक्षम न्यायालय के समक्ष जमानत आवेदन दायर करने के लिए आवश्यक सभी जानकारी शामिल हो। रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए जेल अधिकारियों को भी इसी तरह का निर्देश जारी किया गया है।
ट्रायल कोर्ट को भी सलाह
अदालत ने कहा कि समय पर जमानत आवेदन दायर न करने से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कानूनी सहायता नहीं मिली। न्यायालय ने इस उद्देश्य के लिए समयसीमा प्रदान करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ट्रायल कोर्ट/मजिस्ट्रेट, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और जेल प्राधिकारियों पर यह दायित्व डाला गया है कि वे प्रत्येक घटना पर प्रत्येक कैदी की कानूनी सहायता की आवश्यकता की सक्रियता पूर्वक और स्वतंत्र रूप से जांच करें।