स्थायी लोक अदालत ने दुघर्टना ग्रस्त कार के संबंध में बीमा कंपनी द्वारा अस्थायी पते पर पत्राचार को विश्वसनीय सूचना देना नहीं माना है। लोक अदालत ने बीमा कंपनी द्वारा विलंब के कारण दावे का भुगतान नहीं करने के तर्क को भी ठुकरा दिया है। दारागंज के पीयूष द्विवेदी ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी इलाहाबाद और क्षेत्रीय प्रबंधक यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी लखनऊ के खिलाफ वाद दायर कर बीमा राशि के भुगतान की मांग की थी। स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष एके मालवीय और सदस्यों आरपी सक्सेना तथा प्रमोद कुमार मिश्र की तीन सदस्यीय पीठ ने दावा स्वीकार कर बीमा कंपनी को दुघर्टनाग्रस्त वाहन की मरम्मत में व्यय राशि 88010 रुपये के भुगतान का आदेश दिया है। इस पर नौ प्रतिशत ब्याज और दो हजार रुपये वाद व्यय देना होगा।
पीयूष द्विवेदी की सेंट्रो कार चंडीगढ़ में 20 अक्तूबर 2005 को दुघर्टनाग्रस्त हो गई थी। उन्होंने इसकी मरम्मत का दावा एक लाख 22551 रुपये प्रस्तुत किया। कंपनी के सर्वेयर ने मरम्मत की राशि 88010 रुपये तय की। पीयूष के दावे पर बीमा कंपनी ने कोई निर्णय नहीं लिया। एक वर्ष बाद उनका तबादला गुजरात हो गया। इसके बाद वह पैरालिसिस से ग्रस्त हो गए और ठीक होने के बाद विदेश नौकरी करने चले गए।
दावे की फाइल लंबित रही। इस दौरान वह बीच-बीच में कंपनी के इलाहाबाद दफ्तर जाकर बीमा राशि के भुगतान की मांग करते रहे। 17 जनवरी 2014 को उन्होंने स्थायी लोक अदालत में दावा प्रस्तुत किया। कंपनी ने कहा कि दावा प्राप्त होने के बाद मरम्मत बिल के मूल प्रपत्र देने के लिए पीयूष को कंपनी ने पत्र भेजा था। उन्होंने बिल प्रस्तुत नहीं किए इसलिए फाइल बंद कर दी गई। कंपनी ने यह भी कहा कि मामला 2005 का है। करीब नौ साल बाद बंद फाइल को पुन: नहीं खोला जा सकता है। स्थायी लोक अदालत ने कहा कि वादी का मूल निवास स्थान इलाहाबाद है जहां उसका पूरा परिवार लगातार रह रहा है। कंपनी ने चंडीगढ़ के पते पर पत्र भेजा जो अस्थायी पता था।