पूरब के आसमान पर टिकी हजारों आंखों में उस वक्त खुशी के भाव प्रस्फुटित हुए, जब भोर की झांई छंटने के साथ ही अरुणोदय की लालिमा किरणों की रेख के रूप में धरती पर उतरने को आतुर होने लगी। इसी के साथ छठ माता के जयकारे गूंजने लगे और उगते सूर्य को सर्वकामनाओं की पूर्ति के लिए आखिरी अर्घ्यदान किया जाने लगा। ढोल,नगाड़ों के उत्सवी माहौल में उगते सूर्य को अर्घ्य देने साथ ही चार दिवसीय सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत का पारण व्रतियों ने पारण किया।
संगम तट पर शनिवार की नई सुबह की प्रतीक्षा मध्यरात्रि के बाद ही आंरभ हो गई। अल्पनाओं और दीपमालाओं से सजी षष्ठी माता की यज्ञ वेदियों पर परिजनों के साथ सूर्योदय का इंतजार घंटों किया जाता रहा। लोक भावना के ऊंचे मानकों पर आधारित इस व्रत की लोक परंपरा का दर्शन करने के लिए हजारों की तादाद में लोग घाटों पर पहुंच गए। छठ माता के गीत गाए जाते रहे और खुशियों के फूटते पटाखों की तड़तड़ाहट से वातावरण गूंजता रहा। सूर्योपासना की यह छटा हर किसी के अंतस में रस बस सी गई।
सुबह पूरब दिशा में आसमान में जैसे ही लालिमा छाने लगी, हर तरफ हर हर महादेव और गंगा माता केजयकारे गूंजने लगे। एक तरफ ढोल नगाड़ों पर नृत्य शुरू हो गया और दूसरी ओर आतिशबाजी शुरू हो गई। किला घाट से लेकर संगम तट तक एक जैसा दृश्य रहा। व्रती महिलाएं जल धारा में खड़ी होकर उगते सूर्य की परिक्रमा करने लगीं और पति, पुत्र जल से अर्घ्य दिलाने लगे। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छष्ठी माता से व्रतियों ने सबको उबारने और मंगल करने की कामना की।