कानपुर आईआईटी में विद्यार्थियों की ओर से एनआरसी और सीएए के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान फिर चर्चा में आई शायर फैज अहमद फैज की जिस मशहूर नज्म को लेकर देश भर में कोहराम मचा है, उसे फैज ने तकरीबन चार दशक पहले भारत में सबसे पहली बार इलाहाबाद में ही पढ़ी थी। बाद में इकबाल बानो की आवाज ने तो फैज की इस नज्म को अमर कर दिया। उनकी यह नज्म जितना पाकिस्तान में पसंद की जाती है, उससे कहीं ज्यादा भारत के गजलप्रेमियों की पसंद है।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके इतने मुरीद थे कि वर्ष 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद मोरारजी देसाई की अगुवाई में बनी जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री के तौर पर जब वह पाकिस्तान गए तो वहां वह प्रोटोकॉल तोड़कर फैज से मिले। उन्होंने उनसे एक शेर सुना और उनकी चर्चित नज्म ‘हम देखेंगे’ की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें भारत आने का न्योता भी दिया था। वर्ष 1980 में इलाहाबाद आने पर संस्था अंजुमन ए रूहे अदब ने फैज पर कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन किया, जिसमें फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, फहमीदा रियाज़, उमाकांत मालवीय सहित कई नामचीन रचनाकार भी शामिल हुए थे।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में गीतकार यश मालवीय ने बताया कि सस्वर सरस्वती वंदना से शुरुआत मैंने ही की थी, जो फैज को इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने मुझे मंच पर ही गले लगाने के बाद मेरा माथा चूम लिया था। साथ ही अपना आटोग्राफ भी दिया था। बाद में फैज ने भी पूरे तरन्नुम में अपनी चर्चित नज्म सुनाई तो लोग वाह-वाह कह उठे थे। लोगों को यह नज्म इतनी पसंद आई थी कि गुजारिश पर फैज ने वह नज्म कई-कई बार सुनाई थी। वहीं महादेवी और फिराक की मौजूदगी में लोगों ने भी फैज के साथ इसे गुनगुनाया था। अटल के न्योते पर भारत आए फैज ने इलाहाबाद के अतिरिक्त मुंबई और दिल्ली समेत कई अन्य शहरों में भी यह नज्म पढ़ी और हर बार, हर जगह इसे खूब शोहरत मिली।