इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि घटना में घायल पीड़ित की गवाही सच्ची व दोषसिद्धि का मजबूत आधार होती है। यह अगर चिकित्सा साक्ष्यों से पुष्ट हो तो दूसरे गवाहों के मुकरने के बाद भी अभियोजन की कहानी कमजोर नहीं पड़ती।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह-प्रथम की खंडपीठ ने गाजियाबाद की फैक्टरी में दो चौकीदारों की 41 साल पहले हुई हत्या के दोषी मेघराज सिंह की उम्रकैद बरकरार रखी। मामला गाजियाबाद के लिंक रोड थाना क्षेत्र का है। छह जुलाई 1984 की रात मेघराज दो साथियों के साथ एक फैक्टरी में घुसा। पहले चौकीदार मदन सिंह की हत्या कर दी। शोर सुनकर वहां पहुंचे वीर सिंह की भी पेचकस से हत्या कर दी। बचाव करने पहुंची वीर सिंह की पत्नी सावित्री पर भी हमला किया गया, जिसमें वह घायल हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोनों चौकीदारों की हत्या के लिए उम्रकैद व घायल सावित्री पर जानलेवा हमला करने का दोषी करार देते हुए सात साल की कैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ मेघराज ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जो खारिज कर दी गई।
अपीलार्थी के अधिवक्ता ने दलील दी कि चौकीदार की घायल पत्नी सावित्री की मौजूदगी संदिग्ध है, उसकी चोटें मामूली हैं। ये खुद से भी पहुंचाई जा सकती हैं। सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए हैं। घटना का कोई मकसद भी साबित नहीं हुआ।
कोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही का विशेष महत्व होता है। सावित्री की गवाही स्पष्ट, स्वाभाविक और पोस्टमार्टम व चिकित्सीय साक्ष्यों से पूरी तरह पुष्ट है। छोटे-मोटे विरोधाभास स्वाभाविक हैं। इनसे अभियोजन की पूरी कहानी प्रभावित नहीं हो सकती। यदि प्रत्यक्षर्शी की गवाही विश्वसनीय हों तो मकसद साबित न होना भी दोषसिद्धि में बाधा नहीं है। लिहाजा, कोर्ट ने जमानत पर चल रहे हेमराज की जमानत निरस्त करते हुए बची सजा भुगतने के लिए तत्काल गिरफ्तार करने का आदेश दिया है।