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जयंती पर विशेष : प्रयागराज आने का किराया जुटाने के लिए दो-राहा लिखा शैलेश मटियानी ने

Wed, 14 Oct 2026 07:25 PM IST
विनोद सिंह योगेश नारायण दीक्षित, प्रयागराज

सार

पहाड़ सा संघर्ष लेकिन पढ़ना, सीखना और फिर लिखना जारी रखना। इतना जूनून हो तब कोई शैलेश मटियानी बनता है। प्रयागराज से उनका लगाव ऐसे संघर्ष को विराम सा देता है जिसकी जिंदगी के हिस्से में सिर्फ गम ही आए।
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शैलेश मटियानी, साहित्यकार। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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पहाड़ सा संघर्ष लेकिन पढ़ना, सीखना और फिर लिखना जारी रखना। इतना जूनून हो तब कोई शैलेश मटियानी बनता है। प्रयागराज से उनका लगाव ऐसे संघर्ष को विराम सा देता है जिसकी जिंदगी के हिस्से में सिर्फ गम ही आए। उन्हीं दुखों से ऐसी रचनाएं उपजी जिनके आगे संघर्षों की हद भी छोटी नजर आती है। जीवन के अंत तक प्रयागराज (इलाहाबाद) की गोद को न छोड़ने वाले विरले रचनाकर शैलेश की 14 अक्तूबर को जयंती है।

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सरस्वती पत्रिका के संपादक और साहित्य शोधकर्ता डॉ. रविनंदन सिंह बताते हैं कि मटियानी के जीवन की त्रासदी महाकवि निराला के जीवन से भी विकराल थी। महज 12 वर्ष की उम्र में माता-पिता का दुनिया छोड़ जाना, एक रिश्तेदार के घर नौकर की तरह काम करना, पानी भरना, भैंस दुहना, गाय भैंसों को चराने जाना। कुछ दिन बाद एक दूसरे रिश्तेदार की गोश्त की दुकान में चिकवा का काम करना, गोश्त काटना, मालिक की प्रताड़ना सहना, किसी तरह हाईस्कूल पास करना...यह सब शैलेश की जिंदगी के संघर्ष का छोटा सा हिस्सा है।

शैलेश मटियानी लेखक बनने की इच्छा लेकर 20 वर्ष की उम्र में 1951 में खाली हाथ हल्द्वानी, रानीखेत होते हुए दिल्ली पहुंच गए। वहां अमर कहानी और रंगमहल पत्रिका के संपादक ओमप्रकाश गुप्ता से मिले। उनकी इच्छा इलाहाबाद जाने की थी पर जेब खाली थी। ओमप्रकाश ने रंगमहल के लिए एक उपन्यास लिखने के बदले मदद करने का भरोसा दिया। मटियानी ने ओमप्रकाश गुप्ता के घर से ही कागज लिया और लाल किले के बगीचे में बैठकर केवल तीन दिन में दो राहा नाम से उपन्यास लिख डाला। इसके बदले में 15 रुपये मिले और मटियानी ने इलाहाबाद के लिए दिल्ली छोड़ दिया।

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खाली पेट मटियानी नवंबर 1951 में इलाहाबाद आ गए और सीधे माया पत्रिका के कार्यालय पहुंचे। वहां शमशेर बहादुर सिंह से मुलाकात हुई। शमशेर ने मटियानी को आजीविका की व्यवस्था होने तक अपने घर में रखा। शमशेर ने उन्हें लीडर प्रेस की कैंटीन में लगवा दिया। यहां कैंटीन की जूठी प्लेट धोने का काम मिला। पहले ही दिन धोते हुए एक प्लेट गिरकर टूट गयी और मैनेजर ने बिना खाना खिलाए रात में ही बाहर निकाल दिया।

दिसंबर की सर्दी थी, फुटपाथ पर भटकते हुए एक मकान के बरामदे में दुबककर लेट गए। जब मकान मालिक की नज़र पड़ी तो उन्हें चोर समझकर खूब पिटाई की और बहादुरगंज पुलिस को सौंप दिया। चोर समझकर पुलिस ने पहले तो खूब पिटाई की पर बाद में वस्तुस्थिति समझकर उन्हें भोजन और सोने की जगह दे दी। शमशेर ने एक पत्र देकर पंत से काम दिलाने का अनुरोध किया पर समाधान नहीं निकला।
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मुंबई में खून बेचकर भूख मिटाई

इलाहाबाद से चलकर कुछ दिन मुजफ्फरनगर में एक वकील के घर झाड़ू, पोछा और बर्तन साफ करने का काम किया। वहां से अचानक एक दिन बिना टिकट 1952 में मुंबई पहुंच गए और 1956 तक वहां नारकीय जीवन बिताया। मुंबई में भयंकर यातना, गरीबी और भुखमरी झेली, फुटपाथ पर सोए, कचरे के डिब्बों से जूठन खाई, मुम्बादेवी व अन्य मंदिरों के सामने भिखारियों की कतार में बैठकर भीख मांगी, खून बेचकर पेट की आग बुझाई। जब 1956 में गांव लौटे तो घर वालों ने उनकी शादी करा दी।

प्रयागराज लौटकर पत्रिका निकाली

वर्ष 1965 में मटियानी फिर इलाहाबाद आए और जीवन के अंत तक यहीं रहे। इलाहाबाद के किताब महल प्रकाशन से उनकी सारी पुस्तकें प्रकाशित करने का अनुबंध हुआ लेकिन एक साल बाद यह अनुबंध भी टूट गया। आजीविका और रुचि को ध्यान में रखकर 1967 में विकल्प नामक अर्द्ध वार्षिक पत्रिका निकालनी शुरू की। स्वयं संपादक बने और बटरोही को सहायक संपादक बनाया। साल 1967 से 1977 तक विकल्प के केवल सात अंक ही निकल पाए। बाद में जनपथ नामक अन्य पत्रिका भी शुरू की पर केवल दो अंक ही निकाल सके। इसी बीच 1992 में छोटे पुत्र की हत्या हो गई। इस सदमे से मटियानी जी टूट गए, विक्षिप्त से हो गए। इसी अवस्था में साल 2001 में उनके जीवन की विदाई बेला आ गई।

वैल्यू एड

साहित्यभूषण प्रो.सूर्य प्रसाद दीक्षित शैलेश मटियानी के रचना संसार को विविधता और जनमानस की पीड़ा को बताने वाला संग्रह मानते हैं। लगभग 30 उपन्यास, इतने ही कहानी संग्रह, सात लोककथा संग्रह, 16 बाल साहित्य और 13 निबंध संग्रह का प्रकाशित होना शैलेश मटियानी के लिखने की जिद को बताता है।
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