सर्द हो रहे मौसम में इलाहाबादी अमरूद की खुशबू फैलने के साथ ही एक बार फिर अकबर इलाहाबादी की याद ताजा हो गई है। वह कहते थे, कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के, यां धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के।
सर्द हो रहे मौसम में इलाहाबादी अमरूद की खुशबू फैलने के साथ ही एक बार फिर अकबर इलाहाबादी की याद ताजा हो गई है। वह कहते थे, कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के, यां धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के।
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उर्दू अदब के मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी 16 नवंबर 1846 को इलाहबाद जिले के बारा कस्बे में जन्मे थे | उनका असली नाम सय्यद अकबर हुसैन रिजवी था। बुनियादी शिक्षा के बाद वह रानी मंडी मोहल्ले में रहने लगे, मकान का नाम उन्होंने इशरत मंजिल रखा था। बाद में वह यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज बना। पहली ही गजल से ही उन्होंने लोगों को अपना दीवाना बना दिया था। 21 साल की उम्र में अपने पहले मुशायरे में दो लाइनें कही थीं-
समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
अकबर ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का।
इसके बाद अकबर इलाहाबादी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बड़ी ही सहजता और हल्के-फुल्के अंदाज में बड़ी बात कह जाने का हुनर उनके पास था। उर्दू शायरी में अकबर पहले शख्स थे जिनको बदलते जमाने से अपने सांस्कृतिक मूल्यों के लिए खतरा महसूस हुआ था। उन्होंने यूरोप की तहजीब और शिक्षा को बहुत नजदीक से देखा था। उनकी पहली शिकायत थी कि यह इन्सान को उदार न बनाकर केवल नौकरी पाने का एक जरिया बनाती है। हालांकि, अकबर इलाहाबादी ने खुद अपने बेटे इशरती को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा लेकिन अपने मिजाज के मुताबिक उस पर ये पंक्तियां भी लिखीं-
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इशरती घर की मोहब्बत का मजा भूल गए
खाके लंदन की हवा अहद-ए-वफा भूल गए।
मशहूर उर्दू लेखक शम्सुर्रहमान फारूकी कहते थे, मैं अकबर का उर्दू के पांच या छह सबसे बड़े शायरों में शुमार करता हूं और दुनिया के हास्य व्यंग्य साहित्य में अकबर का मुकाम बहुत बुलंद समझता हूं। मेरा ख्याल है कि अकबर के साथ इन्साफ नहीं किया गया। सतही तौर पर पढ़कर यह फैसला ले लिया गया कि वह दकियानूसी थे।