ई भक्ति के रंग में रंगल गांव देखा /अगल में बगल में सगल गांव देखा/धरम में करम में सनल गांव देखा/ अमवसा नहाए चलल गांव देखा ...। महाकुंभ की तैयारियों के बीच जन कवि कैलाश गौतम की मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर रचित कविता अमवसा क मेला.. एक बार फिर संगमवासियों की जुबान पर है। सोमवार को उनकी 18वीं पुण्यतिथि पर यह पंक्तियां एक बार फिर उनके कविता बिंबों में साकार हुई।
चाहे आलोचक नामवर सिंह रहे हों या फिर दूधनाथ सिंह या धर्मवीर भारती, ऐसे धुरंधर कवियों-कथाकारों और आलोचकों ने कैलाश की कविताओं के मर्म को महसूस किया है। जन चेतना को साकार करने वाले कवि कैलाश गौतम की कविताओं पर आलोचक नामवर सिंह ने कहा था कि कैलाश गौतम जैसी भाषा तो भवानी प्रसाद मिश्र के यहां भी नहीं दिखाई देती है। जिस तरह कैलाश गौतम अपनी कविताओं में भाषा और जन सरोकारों को जीते हैं वह अद्भुत है अप्रतिम है।
प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर दूधनाथ सिंह कैलाश गौतम को जमात से बाहर का कवि बताते हुए कहा था कि कैलाश गौतम किसी सांचे ढांचे में फिट ही नहीं हो सकते वह अलबेले हैं। इसी तरह कवि धर्मवीर भारती ने कैलाश गौतम को गीतों की चेतना का कवि कहा है। कैलाश गौतम सृजन संस्थान के अध्यक्ष उनके पुत्र डॉ श्लेष गौतम बताते हैं कि अगले वर्ष विश्वविद्यालय एवं शिक्षण संस्थानों में कैलाश की कविताओं को लेकर साहित्यिक संवाद शुरू किया जाएगा। युवा छात्रों का काव्य संकलन भी निकाला जाएगा, जिसमें कैलाश गौतम को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए लोक चेतना एवं सरोकार की कविताएं होंगी।
कवि के रूप में वह किस तरह से अपने समय के सच को रेखांकित करते करते हैं, इसे उनकी कविता अमवसा क मेला और पप्पू क दुलहिन ... से समझा जा सकता है। अन्हारे से लड़ाई,गॉंधी जी के साथ ही खड़ी बोली की कविताएं जैसे कचहरी,गंगा,कुर्सी,गॉंव अब भी लोगों की जुबान पर हैं । चंदौली के डिग्घी गांव में आठ जनवरी 1944 को जन्मे कैलाश बनारसी बोली, भोजपुरी और अवधी की कविताओं को लेकर हमेशा लोगों के जेहनोदिल में बसे रहेंगे। श्लेष अंत में दोहा सुनाते हैं-धरा कभी छोड़ी नहीं छूकर भी आकाश/ अजर-अमर तुम हो गए,कविता के कैलाश..।