पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरि।
- फोटो : अमर उजाला।
प्रथम अमृत स्नान के दौरान आपका एक पूर्व टीवी एंकर को रथ पर लेकर पहुंचना कई संतों को चुभ गया!
कुंभ की परंपरा से लोग प्रभावित होते हैं। देखना चाहते हैं कि यह है क्या। मगर, संन्यास का मार्ग बहुत कठिन है। इसमें बड़ा समय लगता है, बहुत तपना पड़ता है। हर्षा रिछारिया ने अभी संन्यास की दीक्षा नहीं ली है। सामान्य दीक्षा है उसको। अगर वह परिवर्तन में आ रही है तो अच्छी बात है।
टीवी सेलेब्रेटी के कारण ज्यादा अहमियत दे दी?
अरे नहीं... मैं इन चीजों पर बहुत ध्यान नहीं रखता। न जाने कितने लोग आते हैं। कौन कितना बड़ा-छोटा है, किस-किस का ध्यान रख पाएंगे।
आपने तो स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन को भी जोड़ लिया!
वह आश्रम की बेटी है। सबसे सरल, सहज महिलाओं में से एक। कुंभ में तो अभी आई, लेकिन मैं उसे डेढ़ वर्ष से देख रहा हूं। उसे नाम दिया, गोत्र दिया। परम सात्विक है। चार दिन हमारी कुटिया में रही। कभी कोई इच्छा प्रकट नहीं की। न कुछ खाने की, न कहीं जाने की। उसके हजारों सवाल जरूर थे।
पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरि।
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कैसे सवाल?
जैसे पुण्य क्या है, परंपरा क्या है, जो आपने दीक्षा दी है वह क्या है, गोत्र क्या है...। हर चीज पर सवाल दर सवाल..।
पॉबेला फिर आएंगी कुंभ में?
अब तो नहीं आएगी। अभी तो अमेरिकी राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने गई है। कुंभ बाद हरिद्वार आश्रम में आएगी। हमारी दिनचर्या देखेगी।
संतों में समाज सादगी का भाव देखता है। लेकिन, इतना लाव-लश्कर क्यों?
हम किसी मोह में नहीं बंधे। यह गंगा की रेती पर बना है। इसे यहीं छोड़ जाना है। साधु अगर मोह से बंधा होता तो स्थायी निर्माण करा लेता, होटल या धर्मशाला बनवा लेता। हमारे पास तो कुछ है नहीं। जो है, सब भक्तों का है। वही एक करोड़ लोगों को भोजन कराएंगे। हम तो बस गइया लेकर आए हैं।
पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरि।
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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि हिंदू समाज से जाति को ही खत्म कर देंगे तो बचेगा क्या। आपका क्या मत है?
सनातन धर्म एक है। नारायण के शरीर से सब पैदा हुए हैं। कर्म के आधार पर इसकी पैदाइश अलग-अलग हिस्सों से हुई है। 14 जनवरी को जब शाही स्नान के लिए हमारी सवारी निकली तो लाखों लोग खड़े थे। यहां कोई जात-पांत नहीं थी। सनातन में जाति विभाजन हो सकता है, कर्म या कर्तव्य विभाजन हो सकता है, पर उद्देश्य एक है। इसके आगे क्या बांटेंगे, यह तो नारायण ने ही यह बंटवारा किया है। मानवीय भेद नहीं है।
...पर समाज में यह खूब दिखता है
मेरा मानना है कि मानवीय भेद से ही भारतीय परंपरा कमजोर पड़ती दिख रही है। लेकिन, सनातन की हम बात करें तो हम सब एक हैं, एक रहना चाहिए। मेरा मानना है कि सारी दुनिया एक दिन सनातनी होगी। इसका समय आ चुका है। रामराज्य की तरह...।
जिन विदेशियों को दीक्षा दी गई, क्या वह सनातनी हो गए?
तुरंत तो नहीं हो गए। इसमें समय लगेगा। लेकिन, आदमी ने एक बार यह मार्ग चुन लिया तो सनातन की परिक्रमा करने लगेगा। फिर उसे दूसरे में आनंद नहीं आएगा। जैसे पॉवेला जॉब्स खिंची चली आई, उसी तरह दूसरे भी चले आएंगे।