सरहद पर हिफाजत के लिए दिन रात पहरा देने और दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले सैनिकों की बीवियां भी कोरोना के खिलाफ युद्ध में पीछे नहीं हैं। वह घरों में रहकर इस लड़ाई को जीतने के लिए मॉस्क और सैनिटाइजर बना रही हैं। छिवकी में ऐसी महिलाओं ने समूह बनाकर काम करना शुरू किया है। कहा जा रहा है कि सेना में तैनात जवानों की पत्नियों की यह पहल हजारों जरूरतमंदों के मददगार बन गई है।
कोविड-19 से घर बैठे लड़ाई में योगदान देने का तरीका कोई सैनिकों की पत्नियों से सीखे। छिवकी स्थित केंद्रीय आयुध भंडार में तैनात सैनिकों की पत्नियां कोरोना के खिलाफ दिन रात पसीना बहा रही हैं। मास्क की अनिवार्यता के बीच बाजार बंद होने की वजहे से परेशान लोगों के लिए यह महिलाएं मददगार बन गई हैं। इसके लिए इन महिलाओं ने एक समूह बना लिया है। इसमें आठ से 10 महिलाएं शामिल हैं। यह महिलाएं सुबह से ही सिलाई मशीनों पर मास्क बनाने में जुट जा रही है। खास बात यह है कि इन महिलाओं ने अब तक आठ हजार से अधिक मास्क तैयार किए हैं। पहले तो इनके हाथ के बनाए कपड़े के मास्क को सीओडी के फायर ब्रिगेड, टेलीफोन ड्यूटी के अलाला सैनिकों व अन्य कर्मचारियों को वितरित किए गए। इसके बाद अब नैनी, छिवकी, चाका व आसपास के इलाकों में उन जरूरतमंदों को मास्क दिए जा रहे हैं, जो लॉकडाउन की वजह से अब तक इससे वंचित थे उनको मास्क दिया जा रहा है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में उतरीं ये महिलाएं अब तक आठ हजार से अधिक मास्क और अन्य सामान बनाकर मुफ्त में जरूरतमंदों को दान कर चुकी हैं। उनकेबनाए मास्क सेना की ओर से वितरित किए जा रहे हैं। सेना के जवान गाड़ियों से जरूरतमंदों को खाने के पैकेट के साथ मास्क और सैनिटाइजर भी दे रहे हैं, ताकि वो इस महामारी से सुरक्षित रह सकें।