तीर्थराज प्रयाग के संगम क्षेत्र में वैज्ञानिकों को विलुप्त धारा (पॉलियो चैनल) के अलग-अलग जगहों पर निशान मिले हैं। टेढ़ी-मेढ़ी, घुमावदार और सीधी लंबी विलुप्त धारा के निशान कौशांबी के सराय अकिल गांव से लेकर त्रिवेणी संगम के बीच इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटीटुमोग्राफी तकनीक पर आधारित सर्वे में नजर आए हैं। हालांकि वैज्ञानिक अभी इससे पूर्ण रूप से सहमत नहीं है कि यह पॉलियो चैनल विलुप्त सरस्वती नदी का ही है। सूखकर टूटी हुई धाराओं (चैनल) कहां से कहां तक लगातार गए हैं और उनके भीतर का पानी खारा है या मीठा या फिर एक जैसा है, इसका अध्ययन करने के लिए दूसरी तकनीकों का सराहा लिया जाएगा।
छह सौ किलोग्राम वजन वाले भू-भौतिकीय ट्रांसमीटर से बृहस्पति वार से संगम क्षेत्र की चिह्नित एरिया में हेलीकॉप्टर के जरिए विलुप्त धारा का थ्रीडी डाटा संग्रह करने का काम आरंभ होगा। फिलहाल पॉलियो चैनल मिलने से केंद्रीय भूमि जल आयोग, नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट हैदराबाद और डेनमार्क के स्काईटेम सर्वे एप्स के वैज्ञानिक सरस्वती नदी की धारा की खोज को लेकर उत्साहित हो उठे हैं। उनका कहना है कि कोशिशें की जा रही हैं और आने वाले समय में इस रहस्य से पर्दा जरूर उठेगा।
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. वाईबी कौशिक के नेतृत्व में कौशांबी जिले के फन गांव में कैंप कर रहे वैज्ञानिकों ने बृहस्पतिवार को भूगर्भीय रहस्यों का पता लगाने में सक्षम आधुनिक तकनीक से लैस सीएसआईआर के हेलीकॉप्टर से हवाई सर्वेक्षण आरंभ किया। इस दौरान कई जगहों पर सूखी हुई धारा की लंबी सतह देखी गई। गंगा-यमुना के आसपास से गुजरे यह पॉलियो चैनल(विलुप्त) धारा के निशान कहां से कहां तक हैं और इनका आकार कितना बड़ा, कितना गहरा है, इसे लेकर अभी 15 दिनों तक डॉटा संग्रह का काम चलेगा। सर्वेक्षण दल के साथ आए राष्ट्रीय भूगर्भ जल अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. सुभाष चंद्रा का कहना है कि इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटीटुमोग्राफी तकनीक से विलुप्त धारा के चैनल दिखाई पड़े हैं । यह निशान कौशांबी में 1500 से 2000 फीट गहराई में मिले हैं। हेलीकॉप्टर के जरिए भूगर्भ का अध्ययन करने के बाद मिलने वाले डाटा के आधार पर निर्धारित स्थानों पर ड्रिलिंग और लॉगर मशीन से लॉगिंग कराई जाएगी, ताकि चैनलों को जोड़कर उनके अस्तित्व, प्रकार और एकरूपता का पता किया जा सके। फिलहाल सरस्वती नदी की विलुप्त धारा के रहस्यों का पता करने के लिए सतह से 500 मीटर की गहराई तक थ्रीडी डाटा जुटाया जा रहा है।
त्रिवेणी संगम में गंगा, यमुना के अलावा तीसरी नदी सरस्वती का वजूद जानने के लिए भू-जल वैज्ञानिकों की टीम ने अकबर के किले में संरक्षित सरस्वती कूप का भी निरीक्षण किया है। संगम क्षेत्र में विलुप्त धारा का अध्ययन इसी सरस्वती कूप को केंद्र मान कर किया जा रहा है। इसके जल के नमूने लेकर उनका परीक्षण भी किया गया है। इसके अलावा झूंसी में स्थित समुद्र कूप के जल के नमूने की भी वैज्ञानिकों ने जांच कराई है। इस जांच में चौंकाने वाली जानकारी मिली है। सरस्वती कूप को आम जनमानस में सरस्वती नदी की धारा के रूप में ही माना जाता रहा है। केंद्रीय भू-जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. वाईबी कौशिश ने बताया कि सरस्वती कूप के जल में दो हजार माइक्रोसीमन विद्युत चालकता पाई गई है। जो गंगा, यमुना के जल से बहुत भिन्न है। इसी तरह समुद्र कूप के जल के नमूने के परीक्षण में उसके जल में चार हजार माइक्रोसीमन विद्युत चालकता पाई गई है। भू-जल वैज्ञानिक डॉ. राकेश सिंह का कहना है कि समुद्र कूप का जल समुद्र के जल से भी अधिक खारा है। सरस्वती कूप के जल में भी खारापन औसत से बहुत अधिक है। इससे माना जा रहा है कि गंगा -यमुना के साथ वहां कभी कोई अलग धारा भी बहती रही होगी।
गंगा-यमुना के बीच विलुप्त जल धाराओं में प्रचुर खनिज संपदा के भंडार होने का भी अनुमान है। यह खनिज अलग-अलग तरह के हो सकते हैं। अब तक के अध्ययन में गंगा के किनारे मिट्टी-बालू के भंडारण के अलावा यमुना की तटीय मिट्टी के भंडारण का भी अध्ययन किया जा रहा है। गंगा और यमुना की बालू-मिट्टी के नमूनों में भी अंतर मिला है। गंगा की बालू मोटी है, जबकि यमुना की पतली और बारीक। इस आधार पर विलुप्त धारा के भीतर के खनिजों का मिलान किया जाएगा। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिकों का कहना है कि संगम क्षेत्र में 350 मीटर यानी 1100 फीट नीचे पत्थर की चट्टानों की परतें भी देखी गई हैं। उन चट्टानों के भीतर खनिज संपदा के भंडार हो सकते हैं। (ब्यूरो)
त्रिवेणी संगम में अदृश्य सरस्वती की कल्पना सच साबित हो सकती है। यह कहना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एचएन मिश्र का। उनका कहना है कि रामायण काल के बाद तक करीब पांच हजार वर्ष पूर्व प्रयाग में सरस्वती नदी के बहने के प्रमाण ग्रंथों में मिलते हैं। रामायण, महाभारत में सरस्वती का उल्लेख कई बार आया है। नदियां अपनी पारिस्थितिकी बदलती रहती हैं। ऐसे में प्रयाग संगम में सरस्वती को सिर्फ कल्पना नहीं माना जा सकता। (ब्यूरो)
यमुनोत्री के उद्गम से निकली सरस्वती और प्रयाग में खोजी जान वाली सरस्वती की धारा में अंतर है। राजस्थान, गुजरात में कभी बहने वाली अन्नयादिनी सरस्वती से जोड़कर त्रिवेणी संगम की विलुप्त धारा को नहीं देखा जाना चाहिए। यह कहना है केंद्रीय जल बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. राकश सिंह का। उनका कहना है कि गंगा, यमुना के साथ पौराणिक काल में बहने वाली सरस्वती की धारा अलग रही होगी। इसीलिए इस विलुप्त धारा पर अलग तरीके से काम हो रहा है।(ब्यूरो)