इलाहाबाद। तेजी से बदलती दुनिया और बाजारीकरण के दौर में शिक्षकाें के कई रूप सामने हैं। गुरु और शिष्य के बीच दूरियां बढ़ी हैं तो शिक्षा के बाजार बढ़ी खरीद-फरोख्त ने गुरुजनों का मान गिराया है। इन सबके बावजूद देश के पहले कुलपति के रूप में जाने जाने वाले महर्षि भारद्वाज की संगमनगरी में शिक्षा को समर्पितजनों की ऐसी फेहरिस्त है, जिन्होंने शिक्षा की अलख जगाए रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। कई शिक्षकों ने देहदान कर गुरु दधीचि की परंपरा को आगे बढ़ाया तो कइयों ने शिक्षा के लिए सर्वस्व दान कर दिया। देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.राधाकृष्णन की जयंती पर ऐसे ही गुरुओं को प्रणाम है, जिन्होंने शिक्षा दान, योगदान या फिर देहदान करके समाज के लिए आदर्श स्थापित किया।
मेधावियों के लिए गोल्ड मेडल, छात्रवृत्ति
सीएमपी डिग्री कालेज के बॉटनी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ.राजेश्वर प्रसाद का नहीं रहे लेकिन उनकी इच्छा के अनुरूप पत्नी डॉ.ऊषा श्रीवास्तव ने उनके नाम पर एमएससी प्रथम और द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों के लिए गोल्ड मेडल देने की घोषणा की है। इसी क्रम में एक मेधावी को छात्रवृत्ति भी दी जाएगी।
लाइब्रेरी को दे दिया डीन का भत्ता
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डीन कला के पद पर मार्च 2015 से जुलाई 2016 तक रहे प्रो.ए.सत्यनारायण ने भत्ते में मिली राशि लाइब्रेरी को दे दी है। इस दौरान उन्हें प्रत्येक माह 2500 रूपये मिले। उनका कहना है, मिल रहा वेतन पर्याप्त है, उक्त राशि से जरूरतमंद बच्चों के लिए किताबें मंगाई जाएंगी।
हर विद्यार्थी की शिक्षा पर पूरा ध्यान
प्राथमिक विद्यालय बिशुनदास के पूरा सोरांव के प्राथमिक विद्यालय की संस्थापक हेडमास्टर और वर्ष 2015 में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान हासिल करने वाली सरिता द्विवेदी बच्चों की पढ़ाई को मिशन मानती हैं। इसीलिए वह स्कूल के प्रत्येक विद्यार्थी की शिक्षा पर पूरा ध्यान देती हैं। यही वजह है वर्ष 2012 में स्कूल खुलने से लेकर अब तक की मेहनत से विद्यालय, जिले के अच्छे स्कूलों में शामिल हो सका है।
0 गांव के स्कूल में कान्वेंट जैसी शिक्षा
उच्च प्राथमिक विद्यालय खेस्का, करछना की प्रधानाध्यापिका रोशन नाहिद ने गांव के लोगों के सहयोग एवं अपनी इच्छा शक्ति से विद्यार्थियों को कान्वेंट जैसी शिक्षा देकर मिसाल कायम की है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की तर्ज पर गिफ्ट और क्लैपिंग जैसे प्रोत्साहन गतिविधियों से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास भरा है। गांव के स्कूल में बच्चों के लिए लाइब्रेरी, लैब, साफ-सफाई की व्यवस्था कराई है। वह जरूरतमंद विद्यार्थियों को आर्थिक मदद के साथ पढ़ाती भी हैं।
जरूरतमंदों को फीस, किताबें देते हैं कपिल
गुजराती मोहल्ले के कपिल सहगल जरूरतमंदों की शिक्षा के लिए कटिबद्ध हैं। वह ऐसे विद्यार्थियों को ड्रेस, फीस, किताब आदि मुहैया कराकर उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाने में जुटे हैं। उनकी सूची में 22 छात्राओं सहित आठ छात्र शामिल हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई में दिक्कत आई थी सो उन्होंने जरूरतमंदों को पढ़ाने का संकल्प लिया। सत्तर बरस के कपिल अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा खर्च करने के साथ साइकिल से घूम-घूम कर दूसरों से भी धन जुटाते हैं।
गुलामी के वक्त बेटियों को सिखाई इंग्लिश
आजादी से पहले बेटियों को राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की पहल पर अंग्रेजी सिखाने वाली गौरी पाठशाला से रिटायर 99 बरस की शिक्षिका उर्मिला मालवीय को आज भी इस बात पर नाज है कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत में ऐसा किया। टंडन जी ने कहा था, क्या गोरी मेम ही हमारी बेटियों को अंग्रेजी सिखाएंगी और उर्मिला जी जुट गईं। सिविल लाइंस की अस्सी बरस की सुधा कपूर सहित उनके अन्य शिष्य आज भी उनका आशीर्वाद लेने आते हैं।
विद्यार्थियों की मदद करतीं मोनिका दत्त
अनुशासन में कड़क पतंजलि ऋषिकुल की प्रिंसिपल मोनिका दत्त विद्यार्थियों की अन्य जरूरतें भी पूरी करती हैं। उन्होंने स्कूल और निजी प्रयास से तीन बच्चों के गंभीर रोगों की पहचान करके उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाने में आर्थिक मदद की है। बीमारी केदौरान भी बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखी। अब वह विद्यार्थी पूरी तरह से स्वस्थ है।
गांव की प्रतिभा को राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाया
फूलपुर के करीब के गांव की बेटियों को कबड्डी का प्रशिक्षण देकर राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने का काम किया है मुंशी खुर्द गांव के बिजलेश सिंह और कसरावलडीह गांव के कबड्डी के राष्ट्रीय खिलाड़ी मकसूद अहमद ने। गांव के मैदान पर खेल की सुविधा न होने के बावजूद इन खेल प्रशिक्षकों ने बेटियों को राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर की प्रतियोगिता के लिए तराश कर अलग पहचान दिलाई और कबड्डी जैसे खेल में आगे बढ़ाने का हौसला दिया।
देहदान
मृत्यु से पहले जताई थी देहदान की इच्छा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्य एवं आधुनिक इतिहास विभाग से रिटायर प्रोफेसर राधा पंत जीवन के आखिरी पड़ाव में भी देहदान करके लोगों को राह दिखा गईं। उनकी इच्छा के अनुसार निधन के दो घंटे के भीतर मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ.एसपी सिंह ने उनकी आंखें सुरक्षित कर लीं जिससे दो लोगों के जीवन में रोशनी लौट आई है। उनका शरीर भी मेडिकल कालेज को समर्पित कर दिया गया है।
सिखा र्गइं जीवन का फलसफा
बांदा के उमर वैश्य बालिका इंटर कालेज में शिक्षक रहीं एलनगंज की सोमलता मिश्रा का 82 वर्ष की उम्र में निधन हुआ तो उनकी आंखें भी दो लोगों के जीवन को रोशनी दे गईं। उन्होंने निधन से एक महीने पहले ही बेटे रंजन मिश्रा से देहदान की इच्छा प्रकट की थी। उनका पार्थिव शरीर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज को समर्पित कर दिया गया।