सुनने यह भले ही अजीब लगे मगर सच है। इलाहाबाद हाईकोर्ट समक्ष एक ऐसी याचिका दाखिल की गई, जिस पर कोर्ट भी चकित थी। एक सात माह के अजन्मे भ्रूण की ओर से दाखिल याचिका में उसकी मां की गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की गई। कहा गया कि चूंकि अजन्मा भ्रूण भी भारतीय दंड संहिता की धारा 11 में दी गई व्यक्ति की परिभाषा के तहत आता है, इसलिए यदि मां को गिरफ्तार किया गया तो भ्रूण भी बिना अपराध गिरफ्तार हो जाएगा। इससे उसकी स्वतंत्रता बाधित होगी।
कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि अजन्मे भ्रूण की आजादी को कोई खतरा नहीं है, क्योंकि अभी वह मां के गर्भ में है और जैसे ही जन्म लेगा आजाद होगा। याचिका मथुरा की ज्योति सारस्वत के गर्भ में पल रहे भ्रूण की ओर से बेबी सारस्वत (28 सप्ताह का भ्रूण) के नाम से दाखिल की गई थी। इस पर अधिवक्ता विनायक मिथल ने पक्ष रखा। याचिका पर न्यायमूर्ति अभिनव उपाध्याय और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की पीठ ने सुनवाई की।
ज्योति सारस्वत के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा मथुरा के फरह थाने में दर्ज है। उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी। 19 नवंबर 2018 को उसकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उसके गर्भ में पल रहे सात माह के भ्रूण की ओर से याचिका दाखिल की गई। अधिवक्ता का तर्क था कि अजन्मा भ्रूण भी कानून की नजर में एक व्यक्ति है। याचिका में आईपीसी की धारा 11 में वर्णित ‘व्यक्ति’ की परिभाषा का आधार लिया गया है।
इसके मुताबिक ‘कोई भी व्यक्ति या संगम, या व्यक्ति निकाय चाहे वह निगमित हो या नहीं, व्यक्ति शब्द के अंतर्गत आता है।’ अधिवक्ता की दलील थी कि भ्रूण उसी प्रकार से व्यक्ति है जैसे कि एक कंपनी जो निगमित नहीं है, व्यक्ति की परिभाषा में आती है।
भ्रूण भी अनिगमित कंपनी की तरह व्यक्ति है। इसलिए एक व्यक्ति को उसे धारण करने वाली मां पर लगे आरोपों के आधार पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ का कहना था कि भ्रूण मां के गर्भ में है। उसकी आजादी को कोई खतरा नहीं। जन्म लेते ही वह आजाद होगा। कोर्ट ने याचिका को दिग्भ्रमित करने वाली मानते हुए खारिज कर दिया है।