प्रयागराज के टालस्टॉय थे नीलकांत : डॉ. इम्तियाज गाजी
प्रयागराज। गुफ्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा, नीलकांत जी सच्चे मायने में साहित्यकार थे। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उनकी कहानियों में प्रेमचंद और टालस्टॉय के बिंब स्पष्ट रूप से नजर आते हैं। उनके निधन से पूरे साहित्य जगत के साथ-साथ प्रयागराज के साहित्य को बड़ी क्षति पहुंची है।
चले गए हिंदी के एकांत साधक नीलकांत
नीलकांतजी का जाना साहित्य जगत को सूना कर दिया है। इविवि के हिंदी विभाग के प्रोफेसर कुमार वीरेंद्र बताते हैं, झूंसी स्थित एक कमरे के मकान में में खुद खाना बनाकर खाते थे। इसी में से कुछ हिस्सा गोरैया, बुलबुल, तोता, मैना और कौआ को खिलाते थे। उनके बगीचे में अल्फांसो आम, नींबू, आंवला, पपीता, अमरूद में से कोई न कोई एक फला ही रहता था। उनके बीच बैठकर नीलकांतजी रोज लिखते-पढ़ते रहते थे। वे जहां भी सोते थे, उसी पर किताबें और समकालीन पत्रिकाएं रहती थी। हाथ में स्वनिर्मित छड़ी, मुंह में मगहिया पान, सिर पर हैट और कंधे पर शांति निकेतनी झोला लेकर साहित्य के एकांत साधक की तरह निकलते थे। उन्होंने बताया कि ग्रेटर नोएडा के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में देहदान किया गया है।
आज के सबसे वरिष्ठ और चमकदार सितारे नीलकांत जी का देहावसान, इलाहाबादी साहित्यिक आभा मंडल को बहुत धुंधला कर गया है। उनके लिए नीलाभ जी के शब्द थे, यकीन मानो इतना सौम्य, सज्जन और शरीफ व्यक्ति है कि कभी-कभी नीलगाय कहने को जी चाहता है। - भूमिका अश्क, कथा लेखिका