इलाहाबाद (ब्यूरो)। हिंदुस्तानी एकेडमी में लगी ‘मृगनयनी’ प्रदर्शनी में सजी पीतल और पंचधातु की मूर्तियां सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। जितनी सुंदर यह मूर्तियां हैं, उतना ही कठिन परिश्रम इन्हें बनाने में लगता है। हर मूर्ति की शुरुआत प्रभु के नाम से होती है। जिससे हर मूर्ति सुंदर और आकर्षक बने। मूर्ति बनी है कि नहीं यह तय होता है धूप-छांव से। जैसे-जैसे धूप बढ़ती जाती है उससे निर्धारित होता है कि मूर्ति बनी है की नहीं।
मृगनयनी प्रदर्शनी के प्रभारी प्रबंधक एमएल शर्मा ने बताया कि इन मूर्तियों को टीकमगढ़ के सिंब सोनी गली में रहने वाले कारीगर राम स्वरूप सोनी और गोदावरी सोनी बनाते हैं। सबसे पहले मिटट्ी का सांचा बनाया जाता है। इसके बाद इसमें वैक्स वायर की डिजाइनिंग की जाती है। इसे फिर से मिट्टी से ढका जाता है और बीच-बीच में छेद कर दिए जाते हैं। इसके बाद इसमें पिघला हुआ धातु डालकर इसे पकाया जाता है।
मूर्तियां बनी है कि नहीं यह धूप-छांव से तय होता है। राम स्वरूप सोनी के बेटे राहुल सोनी ने बताया कि मूर्ति के सूखने के बाद सांचे को तोड़ दिया जाता है। इसके बाद नक्काशी का काम धातु की कलम से किया जाता है। इस समृद्ध विरासत को सहेजने के लिए सरकार की ओर से 1990 और 2007 में इन्हें राष्ट्रीय अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। प्रदर्शनी में 200 ग्राम से 68 किलो तक की प्रतिमाएं हैं। जिनकी कीमत 550 रुपये से लेकर 71 हजार रुपये तक है। दस दिनों से चल रही प्रदर्शनी का समापन सोमवार को हो जाएगा।