यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव में विकास के मुद्दों पर मुंह के बल गिरी भाजपा और कांग्रेस भी अब जातिगत राजनीति के रास्ते पर चलकर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में हैं। दोनों पार्टियों को मालूम है कि यूपी में सपा और बसपा के परंपरागत वोटों पर सेंध लगाना आसान नहीं, सो उनकी नजर अब बिखरे सवर्ण वोटों पर है। मिशन-2017 के तहत दोनों ही दलों ने इस दिशा में कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस ने तो टिकट के दावेदारों से आवेदन पत्र भरवाने भी शुरू कर दिए हैं और दावेदारों से यह भी पूछा जा रहा है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में किस जाति के कितने वोटर हैं।
जिले मेें कुल वोटरों की संख्या तकरीबन 40 लाख है। इनमें 35 फीसदी के आसपास ओबीसी और 20 से 22 फीसदी सवर्ण वोटर हैं। सवर्ण वोटरों में मुख्य रूप से ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ और बनिया जाति के वोटर हैं। इसके अलावा मुस्लिम वोटरों की संख्या तकरीबन 15 फीसदी है जबकि एससी-एसटी वोटरों की संख्या 18 फीसदी के आसपास है। भाजपा के लिए मुस्लिम वोटरों को साधना चुनौती होगी। साथ ही ओबीसी और एससी-एसटी वोटरों को रिझाना भी आसान काम नहीं। भाजपा के सूत्रों के मुताबिक अगर सवर्ण वोटर उनके लिए एकजुट होते हैं तो आगामी चुनाव में उनकी राह आसान हो सकती है, सो सवर्ण वोटों पर कब्जे के लिए पार्टी ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वहीं, कांग्रेस की नजर भी मुस्लिम वोटरों के साथ सर्वण वोटरों पर है।
पार्टी के नीति निर्धारक जानते हैं कि जातिगत राजनीति में माहिर सपा और बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाना आसान नहीं है। पिछले 20 वर्षों से सपा और बसपा के बीच सत्ता का आदान-प्रदान होता रहा है। इस दौरान सवर्ण वोटर हाशिए पर चले गए। सपा ने सिर्फ यादव जाति या मुस्लिमों के लिए काम किया तो बसपा का पूरा ध्यान एसटी-एसटी वर्ग पर रहा जबकि सर्वण वोटरों की संख्या इन सबसे अधिक है। ऐसे में वर्षों से बिखरे सवर्ण वोटर अगर एकजुट होते हैं तो पूरा समीकरण पलट सकते हैं।
अगर सवर्ण वोटर कांग्रेस के लिए एकजुट हो गए तो पार्टी के लिए बोनस ही साबित होंगे। ऐसे में कांग्रेस ने भी सवर्णों को साधना शुरू कर दिया है। इलाहाबाद में 12 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें सबसे अधिक सवर्ण वोटर शहर उत्तरी में हैं। कांग्रेस इन दिनों सभी विधानसभा क्षेत्रों से टिकट के दावेदारों से आवेदन पत्र भरवा रही है लेकिन शहर उत्तरी को वहां के मौजूदा विधायक अनुग्रह नारायण सिंह के लिए रिजर्व कर दिया गया है। इस सीट के लिए किसी भी दावेदार से आवेदन नहीं लिए गए। अनुग्रह कांग्रेस के उन सवर्ण चेहरों में एक हैं, जिनका वोटरों और पार्टी में खासा प्रभाव है।
‘इसमें कोई शक नहीं कि चुनाव में जाति भी एक फैक्टर है। जहां तक सवर्ण वोटरों की बात है तो इनमें शुरू से ही बिखराव की स्थिति रही है। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में हवा का रुख बदला है। ऐसे में 20 से 22 फीसदी सवर्ण वोटर एकजुट होते हैं तो निश्चित ही समीकरण बदल सकते हैं।’प्रो. एचके शर्मा, राजनीति विज्ञान विभाग, इविवि